इंद्रावती सूखने का कारण

पिछले दिनों जब एक समाचार ने पूरे जिले के चुनावी माहौल को हिला कर रख दिया । तो पूरे पर्यावरण विद् व प्रकृति प्रेमी एक साथ खड़े हो गये । दरअसर जगलपुर के जलप्रपात चित्रकोट और तिरथ गढ़ में अप्रेल के महिने में ही पानी पूरी तरह सूख गया News papers की हेडलाईन्स बनी । ऐसा पहली बार हुआ जब साल भर पानी का झरना बहाने वाले ये जल प्रपात केवल पत्थरों को ढांचा बन गये थे।

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चित्रकोट क्यों सूखा?

कोई भी जलप्रपात या अन्य water source नदियों और पहाड़ों पर निर्भर रहते है। और यहां की प्रमुख नदी इंद्रावती ही है ।यह गोदावरी की सहायक नदी भस्केल की उपनदी है लो उड़िसा के कालाहंडी से निकलकर बस्तर में आती है और चित्रकोट जल प्रपात का निर्माण करती है । जिसे पर्यटन विभाग ने अमेरिका के मिनि नियाग्रा प्रपात भी कहा है। और जिसका संरक्षण संवर्धन के बावजूद पत्थरों का ढांचा बनना एक सवाल खड़ा करता है जिसकी चर्चा हमने “चित्रकोट क्यों सूखा?” नामक ब्लाॅग में की थी।
चूंकि इंद्रावती नदी के कारण ही यहां  चित्रकोट का निर्माण हुआ है और ये भी गर्मियों में सूखने लग जाता है। आईए बात करते हैं नदियां सूखती क्यों है और इन्हें कैसे बचाया जा सकता है।

इंद्रावती के सूखने का क्या है कारण  इंद्रावती का प्रवाह अनवरत काल से चला आ रहा है और अचानक ऐसा क्या हुआ कि यह नदी सूख गयी  आईए जानते है कारणों

जरूरत से ज्यादा चेक डैम का निर्माण

1. छत्तीसगढ़ में जोरा नाला के पास जो एनीकेट बना उस दिन से बस्तर में इंद्रावती के बुरे दिन शरू हो गये। और सरकारी नुमाइंदे इस पर कुछ भी बोलने से कतरा रहें है। क्योंकि गलती तो हो गई अब उसे सुधार कर पाना बहुत मुश्किल है।

2. दूसरी बात जो हुई वह है भस्केल नदी का बचा खुचा पानी जो बस्तर आ रहा था उसे भी एक एनीकेट बनाकर नगरनार स्टील प्लांट की सप्लाई के लिए बंद कर दिया गया है कुल मिलाकर भगवान ही मालिक है बस्तर का।

3. जानकारों का मानना है कि भस्केल संगम पर जो एनीकेट बने है उससे बस्तर को कम उड़िसा को ज्यादा फायदा पहॅुच रहा है। सोचने वाली बात ये है कि इस दिशा में जनप्रतिनिधि उस वक्त और आज क्या कर रहें है ?

4. इसके बाद छोटे बड़े 10 -15 एनीकेट बनाए गए जो इंद्रावती के बहाव को पूरी तरह से तहस नहस कर दिये , जिसका सीधा असर ये देखने को मिला कि चित्रकोट का पानी पूरी तरह सूख गया ।

अब एक ही बात रह जाती है जब भी कोई वीआईपी चित्रकोट देखने जाता है तो एनीकेट को खोल दिये जाते है। फिर उनके जाते ही एनीकेट बंद । गर्मियों में यही सिलसिला चलता है । यानि आम जनता चित्रकोट प्रपात की सुंदरता बरसात मंे ही निहार सकती हैं ।

ये तो थे इंद्रावती की दुर्दशा के कारण वैसे नदियों के सूखने के भी कारण होते है

जिसकी चर्चा कर लेनी चाहिए । तो जानते हैं क्यों नदियां सूखती है इसे इंद्रवती के परिपेक्ष में भी देखना चाहिए।

जो नदियां बारहमासी होती है उनमें जो पानी का source  होता है वे होती है बरसात का पानी या फिर पेड़ पौधे

दरअसल पेड़ की जड़े मिट्टी को को एक स्पंज की तरह छेददार बना देती है। और जब बरसात होती है तो यह जड़े पानी को भी सोख लेती हैं और मिट्टी को थामे रखती हैं और मिट्टी मे मौजूद यही पानी धीरे धीरे करके नदियों में मिलती है । इसीलिए पेड़ों को नदियों के आसपास लगाने की बात कही जाती है । बरसात के दिनों में जब पानी जमीन पर बहता है तो काफी हिस्सा वो अपने साथ काट कर ले जाता है मगर पेड़ पौधे लगे हो तो उनकी जड़े पानी को सोख लेती है और जमीन के कटाव को रोकती है। इसी से जमीन में नमी बनी रहती है और जमीन उपजाऊ बना रहता है । तो अगर नदियों को बचाना है तो पेड़ लगाना ही हितकर होगा ।
साथ परंपरगत जल स्त्रोतों अगर होगें तो पानी के लिए नदियों पर निर्भरता कम हो जाएगी। पानी उन्ही स्त्रोतों से प्राप्त होगा। मिसाल के तौर पर तालाब और कुंआ।
दुर्भाग्य से तालाब और कुओं का चलन आजकल कम हो चला है क्योंकि इससे वे ज्यादा जगह घेर लेते है। मगर सच्चाई यही है कि तालाब होने से सिंचाई के लिए नदियों पर निर्भरता कम हो जाएगी। नदियों पर स्टाप डेम और चेक डेम बनाने की बात ही नहीं आएगी। और नदियों का बहाव सुरक्षित रहेगा।
बस्तर में सिंचाई के लिए चेकडैम का धड़ल्ले से निर्माण किया गया और उसका खामियाजा यहां के पर्यटन के लिए विख्यात चित्रकोट जलप्रपात सूख गया।

फिर निर्माण कार्य के दौरान आज कल सीसी सड़क का उपयोग किया जा रहा है इससे नुकसान यह है कि जमीन पानी को सोख नहीं पाता और इसे अन्य स्रोतों जैसे तालाबों कुंओं तथा नदियों तक नहीं पहॅुचा पाता और बर्बाद हो जाता है।

दूसरा जितना वाष्पिकरण होगा बरसात भी उतनी ही होगी मगर तालाबों कुंओं और नदियों की संख्या कम होते जाने के कारण वाष्पिकरण ज्यादा नहीं हो पाता और इसका सीधा असर बरसात पर पढ़ता है।

बात यह कि जब प्रकृति हमे बरसात के मौसम में बेहिसाब पानी देती है तो उस पानी को हम यूं ही न बहने दें बल्कि उस पानी का संरक्षण कर गर्मी के दिनों

                 Water Harvesting

में किया जा सकता है और संरक्षण केवल तालाबों और कुओं से हो सकता है। इसके लिए आज कल प्रत्येक घरों में बाटर हारर्वेस्टिंग सिस्टम यानि पानी की खेती का सिस्टम लगा हो तो वह पानी हमें अपने दिनचर्या में उपयोग आ जाएगा और गर्मी के दिनों में इसकी उपयोगिता बड़ जाएगी पानी की किल्लत नहीं होगी।

तथा पानी सभी कार्यो के लिए उपयोग किया जा सकता है। लेकिन हम इस बात से अंजान भूजल स्तर पर निर्भर रहते हैं और या फिर नदी के जल पर । इसका नुकसान यह होता है कि नदियों का दोहन ज्यादा हो जाता है और जनसंख्या बढ़ने के साथ नदियों में अन्य कई समस्याएं आती है जैसे पानी का प्रदूषण इत्यादि।

पानी की बचत ही पानी की बढ़त है

 

जानते है आप घर पर रहकर ही कैसे पानी को बचा सकते है।

ब्रश करते समय नल की टोटी बंद रखिए, पानी उसी समय चालू किजिए जिस वक्त जरूरत हो
टंकी तथा नल में होने वाले लिकेज को तुरंत बंद करें ।

अपने गाड़ियों को धोन की जरूरत हो तो उसे घर में धोने के बजाय कार वाश के दुकानों पर ही दें क्योंकि वे धोने वाले पानी की रिर्साकिल कर उसे दोबारा प्रयोग में लाते है।
एक आम सर्वे के मुताबिक घरेरू काम काज के दौरान भी हम पानी का बचा कर उसका वर्धन कर सकते है जैसे
छोटेमोटे काम काज में जैसे शेव बनाने व नहाने में हम नल को खुला छोड़ देते है। इसके बजाए इसे किस पात्र में लेकर ये करें तो खपत कम होगा।

वैसे नहाने में शाॅवर का उपयोग कम पानी की खपत करता है।

कपड़ों के प्रतिदिन धोने के बजाए एक निश्चित तिथि या तारीख को धोएं इससे पानी की खपत एक बार ही होगी।
जब अपने वाहन, पालतु जानवर को धोने की जरूरत होतो अपने लाॅन या गार्डन में धोएं ताकि पौधांे को अलग से पानी देने से आप बच सकें

इतना सब करने से पहले अपने घर में वाॅटर मीटर अवश्य लगाएं जिससे आपको पता चल सके कि प्रतिदिन कितना पानी का खर्च होता है।

सामान्य तौर पर एक घर में 450 गैलन पानी ही लगता है और अपनी दिनचर्या में हम आज 600 से 700 गैलन उपयोग कर रहें है।
उक्त उपायों को आजमातें है तो प्रति दिन 180 गैलन पानी की बचत हो सकती है। जो 5400 गैलन प्रति महिने होता है यानि साल में में आप 64, 800गैलन पानी बचा सकते है। एक गैलन 3.78 लिटर के बराबर होता है।

 

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Author: adji

2 thoughts on “इंद्रावती सूखने का कारण

  1. इंद्रावती नदी के सूखने के एक नहीं अनेक कारण है लेकिन वर्तमान में इंद्रावती नदी सूखने की बात करने वाले पूरी तरह से गलत हैं। यहां चित्रकोट जलप्रपात सूखने की बात करनी चाहिए लेकिन तथा कथित बुद्विजीवी इंद्रावती सूखने का सुर अलाप कर उड़ीसा पर दोष मढ रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि उड़ीसा की ओर से स्ट्रक्चर निर्माण के बाद छत्तीसगढ़ की ओर पानी का प्रवाह बढ़ा है। भेजपदर में जिस स्थान पर पुल बनाया गया है पूर्व के वर्षो में सूखा रहता था, यही स्थिति बेलगांव में पुल के पास होती थी जबकि इस वर्ष दोनो स्थानों में पानी पर्याप्त मात्रा में है। और नदी में इससे अधिक पानी की अपेक्षा की भी नहीं जा सकती है। सबसे बड़ी गलती वर्ष २००८ में पदस्थ कार्यपालन अभियंता द्वारा की गई जिन्होंने भसकेल एंव इंद्रावती के संगम स्थल से लगभग २ सौ मीटर पर एनीकट का निर्माण करवा दिया जिससे स्ट्रक्चर निर्माण के बाद उड़ीसा से आने वाला पानी भसकेल की ओर वापस जा रहा है जो एक नई जोरा का रूप लेने जा रहा है। इसे प्रमाणित करने के लिए बोरीगांव रोड में भसकेल नदी पर बने पुल का अवलोकन कोई भी कर ले और बेलगांव में संगम स्थल का अवलोकन करने से यह स्पष्ट हो जायेगा की वास्तविकता क्या है, वहीं एनएमडीसी को बेलगांव से मिलने वाले पानी की सप्लाई अब बंद कर देनी चाहिए क्योकि उन्हें तिरिया से पानी की आपूर्ति होने का दावा स्वंयम एनएमडीसी द्वारा किया जा रहा है साथ ही भालूगूड़ा योजना के किसानों को भी पानी की आपूर्ति इस एनीकट से नहीं होती है इस सबसे पहले इस एनीकट को नेस्तनाबूद करने की जरूरत है। चित्रकोट जलप्रपात सूखने की बात है तो इसका कारण चित्रकोट एनीकट निर्माण के बाद नारंगी एंव मारकंडी से आने वाला सिपेज का पानी भी बंद हो गया साथ ही सिंचाई विभाग ने छिंदगांव एंव नदी सागर में भी एनीकट बना दिया जहाँ से भी सीपेज का पानी बंद हो गया। क्योकि एनीकट निर्माण मे नदी के लेबल से २-३ मीटर गहराई तक कांक्रीट की जाती है।

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