तीजन बाई

पंडवानी एक गायन शैली है जिसमें हमारे देश के महाकाव्य महाभारत की कथाओं को रोचक ढंग से बताया जाता है । इस प्रकार की शैली दो तरह की शैलियां है जो काफी प्रचलित और प्रसिद्ध है । ये शैलियां है वेदमती और कपाली  इस ब्लाॅग में पंडवानी के बारे में हम चर्चा कर रहें है।
वेदमती शैली में कलाकार बैठकर अपनी गायन कला दिखाते है तो कपाली शैली में कलाकार खडे़-खडे ही परफार्म करता है।


जब पड़वानी की बात होती है तो तीजन बाई का नाम लेना जरूरी हो जाता है । तीजन बाई आज पूरे विश्व में पंडवानी का पर्याय बन चुकी हैं । तीजन बाई एक ऐसी कलाकार है जो वेदमती और कपाली दोनों ही गायन शैली में महारत हासिल की हुई हैं।
तीजन बाई ने अपना करिअर वेदमती स्टाईल से शुरू किया और फिर आगे चलकर कपाली शैली में भी उन्होंने दक्षता हासिल कर लिया । तीजन बाई ने पांडवों के वनवास को सचित्र चित्रण करने में काफी ख्याति अर्जित की है। और इसी कला के कारण उन्हें देश विदेश में काफी सराहना मिली और भारत सरकार ने उन्हें पद्श्रीसे नवाजा है।।

तो आईए जानते है पंडवानी की पर्याय तीजन बाई के बारे में।

प्रारम्भिक जीवनः-

तीजन बाई का जन्म 24 अप्रेल 1956 को दुर्ग जिले के गुनियारी गांव मंे हुआ। उनके पिता का नाम छुनुक लाल परधी तथा माता का नाम सुखवती था। वे 13 साल की उम्र से पंडवानी गाना शुरू किया और इस प्रकार उनकी ख्याति बढ़ती गई । उनका विवाह 12 साल की उम्र में हो चुका था। मगर महिला पंडवानी गायन को परीधी समाज ने स्वीकार नहीं किया और समाज से बहार कर दिया गया।
शुरूआती दौर में तीजन बाई को काफी संघषों का समाना करना पड़ा । कहते है उन दिनो तीजन बाई को खाना पकाने के लिए बर्तन तक उधार लेेने पड़े थे।

करिअर

तीजन बाई को दुर्ग जिले के चंद्रखुरी गांव में उनके पंडवानी गायन के लिए महज 10 रूपये मिले थे। मगर इस उनके पंडवानी गायन की शैली ने न केवल मौजूद लोगों का दिल जीत लिया बल्कि आसपास के गांवों में भी उनकी ख्याति फैल गई और वे पंडवानी की व्यवसायिक गायिका बन गई। उनकी करिअर की उड़ान उस समय काफी हो गई जब प्रसिद्ध थियेटर कलाकार हबीब तनवीर ने उन्हें तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के समक्ष दिल्ली में पंडवानी गायन का अवसर दिया। फिर वे इस गायन के बूते न केवल भारत बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध हो गयी। पुरस्कारों और सम्मानो की मानों फिर झड़ी से लग गई और वे अंतराष्ट्रीय पंडवानी गायिका बन गई । उन्होंने भारत के अलावा England, France, Switzerland, Germany, Tunisia, Malta, Cyprus, Romania, Mauritius   इत्यादि देशों में भी बड़े-बड़े मंचों में पंडवानी गायन किया ।

पुरस्कार और सम्मान

वे आज भिलाई इस्पात संयत्र में नौकरी करती हैं । भारत सरकार ने उन्हें 1988 में पद्म श्री से सम्मानित किया । 1995 में संगीत नाटक पुरस्कार भी उन्हें मिल चुका है। बिलासपुर विश्वविद्यालय ने डी.लिट की उपाधि से 2001 में सम्मानित किया है। और 2003 में पद्म भूषण से वे सम्मानित की जा चुकी हैं । पंडवानी गायन ने उन्हें जो सम्मान दिया है उससे भारत की ख्याति भी विदेशों में बड़ी है और आज वे अनवरत पंडवानी गायन कर रहीं है। आज तीजनबाई 63 वर्ष की हो चुकी है। मगर इस उम्र में भी वे काफी सक्रिय हैं।

देश के छत्तीगढ़ राज्य की यह कला अब केवन छत्तीसगढ़ की ही नहीं है बल्कि इस कला ने अब वैश्विक रूप ले लिया है। आज पंडवानी में कई और हस्तियां है जो इस गायन कला को देश विदेश में प्रसिद्धी के शिखर पर पहूँचा रहीं है।

इनमें ऋतु वर्मा, झाडूराम देवांगन, पुरूराम निशाद, चेतन देवांगन, शांति बाई चेलक, और उषा बर्ले प्रसिद्ध हैं।

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Author: adji

1 thought on “तीजन बाई

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