बस्तर में आम का त्यौहार

बस्तर में आम का त्यौहार

बस्तर में जनजातिय त्यौहारां का विशेष महत्व है । वे प्रकृति से प्राप्त हर फसल पर कुछ -न-कुछ रस्म करके उसका उपयोग करते हैं धान,ईमली महूआ इत्यादि ऐसे प्रमुख फसल हैं जिसे ग्रामीण एक निश्चित समय में ही प्राप्त करता है और उनका उपयोग करने से पूर्व एक धार्मिक अनुष्ठान करता है। गर्मी के मौसम की शुरूआत आते ही यहां आम के बौर आने शुरू हो जाते है और बस्तर में आम के फसल को भी खाने से पूर्व एक रस्म कर उसे खाया जाता है । और इस प्रकार के रस्म को वे त्यौहार बना कर करते है जिसे आमा खानी कहते है ।ऐसे ही हम एक त्यौहार की बात हम करने जा रहें है जिसे बस्तर में आमा त्यौहार कहते है।। आज इसके बारे में विस्तृत चर्चा करते है क्या है आम खानी और इस त्यौहार को ग्रामीण विशेष रूप से हल्बा समुदाय के लोग कैसे मनाते हैं ?

कब होता है यह त्यौहार

यह त्यौहार गर्मियों के आगमन के साथ मार्च के महिने में शरू हो जाता है यानि चैत्र के महिने में पूर्णिमा तिथि से कछ दिन बाद से ही आरम्भ हो जाता है। और यह लगभग पूरे महिने चलता है। इसमें युवतियों तथा महिलाओं की भागीदारी नहीं होती है। और यह ज्यादातर सप्ताहिक बाजार के दिनों में ही मनाया जाता है।

किस प्रकार मनाते है इसेः-

प्रत्येक आने जाने वालों से एक राशि वसूली जाती है और उस पैसे से त्यौहार के अंत में गामीण एक जगह जमा हो होकर पिकनिक की तरह भोजन बनाते है तथा धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है। राहगीरों से कोई तय राशि नहीं ली जाति है बल्कि जो श्रद्धा पूर्वक मिल जाता है उसे ग्रामीण सहर्ष स्वीकार करते हैं और राहगीर को विदा करते है । ऐसे मौके पर अश्लील प्रतीत होने वाले शब्दों के द्वारा राहगीरों को विदा किया जाता है, जिसके बारे में हल्बा समुदाय की माने तो वे पेड़ लगाएं और पड़ बचाएं जैसे संदेश देना उनका मकसद होता है। यानि प्रकृति से जो बीज प्राप्त करें उनका रोपण भी करें ताकि नए पौधों का निर्माण हो सके । इस नियम का उलंघन अगर हो तो कुछ मिलने वाला नहीं है।
आज की पीड़ी ज्यादातर इस त्यौहार को महज मौज मस्ती का त्यौहार ही मानती है जबकि इसके पीछे वृक्षारोपण और पेड़ां की सुरक्षा का संकल्प छुपा है । साथ ही आपसी मेल जोल को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह त्यौहार काफी महत्व रखता है। इस त्यौहार में आम के फसल की पूजा अर्चना कर खाने का रिवाज है और इसी के चलते वे इसे देवी कृपा मानते हैं और ईश्वर से मिले इस अमूल्य उपहार को वे सहर्ष स्वीकार करते है। अनुष्ठान के दौरान पुजारी आम के दो टकड़ों को देखकर गांव की खुशहाली की प्रार्थना करता है और ईश्वर से कहता है कि गांव में विपत्ति, दुःख न आए।

प्रकृति के प्रति कृतज्ञ है ग्रामीणः

आदिम समाज में पूर्वजों ने जो नियम बनाए उनका पालन यथावत् आज भी हो रहा है । महिने के अंत में जो अनुष्ठान किये जाते है उसमें रस्म के तौर पर गांव की विकास एवं लोगों की जीविकोपार्जन की बातें भी की जाती हैं जिसमें ग्रामीणों को खासतौर पर युवाओं को विकास में भागीदार बनने की सलाह दी जाती है। सीमित साधनों में रहकर जीवन-यापन करने वाले ग्रामीणों को उनकी धरती ही सबसे प्रिय है और उससे जो कुछ भी मिलता है उसी में वे संतुष्ट रहते हैं । यही कारण है कि उनके हर त्यौहार में वे प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं

जबकि आज के समय में मानव भौतिकवादी हो चला है। और इसी जीवन शैली की वजह से वह अपनी आस्थाओं से दूर जा रहा है।

adji

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