जगदलपुर की हकीक़त

जानकार बताते हैं कि जब जगदलपुर को विकसित किया जा रहा था तो लंदन के बर्किंघम पैलेस को ध्यान में रखकर यहां के रियासत कालीन महल (जिसे आज आम लोग दंतेश्वरी मंदिर के नाम से जानते हैं )को केन्द्र बनाया गया था। जाहिर है -वर्तमान दंतेश्वरी मंदिर शहर के दूर कोने से दिखाई देता था ठीक उसी तरह जिस तरह लंदन का बर्किंघम पैलैस दूर से आज भी दिखाई देता है। बहरहाल, आज ये गुजरे ज़माने की बात लगती है । जो लोग 40 दशकों से अधिक समय तक जगदलपुर में गुजार चुके हैं उन्हें इस बात का आभास ज़रूर होगा, मुझे उम्मीद है उन्हें यह भी आभास होगा कि जगदलपुर का विकास बहुत हुआ है मगर बेतरतीब तरीके से । मै इस तल्ख टिप्पणी के लिए क्षमा चाहता हूॅं मगर सच्चाई तो यही है।
इस लेख के माध्यम से मै उन बिन्दुओं पर आपका ध्यान चाहूॅंगा जिससे मैं आहत हॅू। एक जागरूक नागरिक से जगदलपुर की बसाहट को लेकर कोई सवाल पूछ लिजिए तो ऐसे अनगिनत बातों से आप रूबरू होगें जो तर्कसंगत भी लगेगी। मिसाल के तौर पर मेरी नज़र में जगदलपुर ऐसा पहला शहर है जहां शराब की दुकानें और पेट्रोल पम्प शहर के अंदर ही मिलेगी जो किसी बड़ी दुर्घटना के लिए जिम्मेदार हो सकती है।
कल्पना किजिए अगर अनुपमा चैाक, गोविंदसिंह चैाक और दलपत सागर के नजदीक मौजूद पेट्रोल पम्प में कोई अग्नि कांड हो जाता है तो मान के चलिए समूचा इलाका इसकी चपेट में आ जाएगा और जन -धन की हानि होगी उसकी कल्पना मात्र से ही मै सिहर जाता हूॅं
जगदलपुर शहर से मेरा वास्ता कोई 50 दशक पुराना है, मैने शहर के कई नीतिनिर्धारकों से बातचीत की है और जो महसूस किया है, जो जाना है उसे ही आपसे साझा कर रहा हॅूं ।
शराब की दुकानें भी ऐसी ही व्यवसायिक प्रतिष्ठान हैं जो आपको शहर के अंदर ही घनी आबादी वाले इलाके में मिल जाऐगी। मोना लाॅज चैक और अनुपमा चैक की शराब दुकानों पर सुबह शाम एक खास वर्ग की मौजूदगी हर वक्त हंगामा ही खड़ी करती है। खास तौर पर शाम को इन इलाकों से शराफत से गुजरें तो भी किसी -किसी से दो चार हो ही जाती है। महिलाओं और बच्चों के लिए तो इन जगहों से गुजरना ही दूभर है।
पता नहीं हमारे नीति निर्धारकों को क्या सूझी कि ऐसे संगीन प्रतिष्ठानों को शहर के बीच में खड़ा कर दिया । मै कोई दोष नहीं दे रहा मगर बात सोचनीय जरूर है। वहीं दूसरी तरफ जो अस्पताल जो कभी शहर वासियों को थोड़ी बहुत स्वास्थ्य सेवाएं दे रहा था उसे शहर से 12 किमी दूर स्थापित कर क्या साबित करने की कोशिश की गई है पता नहीं । इतना तो जरूर है को आपात स्थति से निपटने के लिए अस्पतालों को तो शहर में ही होना चाहिए ताकि मरीजों को जल्द से जल्द राहत मिल सके । अब हार्ट पेंशन्ट को भी अस्पताल तक पहॅुचने में तकरीबन् 20 मिनिट लगेगा ही और अगर पहॅुच भी गया तो ये जरूरी नहीं है कि आपको चिकित्सकीय सुविधा मिल भी जाएं ।
दुर्घटना के कारणः-
इसमें कोई संदेह नहीं है कि निर्माण कार्य बहुत हुए हैं । और जिस हिसाब से निर्माण हुए हैं उसी हिसाब से दुर्घटनाएं भी बड़ी है आए दिन किसी न किसी चाराहे या सड़क पर एक दुर्घटना अवश्य होती है । और यातायात दबाव भी बड़ा है और प्रशासन ने सिग्नल की व्यवस्था तो कर दी है मगर सिग्नल को अपनाने की ट्रेनिंग लोगों को लेनी हागी। यहां तो बिना लाईसेंस के कच्ची उम्र के आॅटो चालक बेधड़क सड़क पर आॅटो दौड़ा रहें हैं इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। वैसे सड़क दुर्घटनाओं के लिए कई तथ्य हैं जिन्हे मै जिम्मेदार मानता हूूंॅ-जैसे यहां पैदल चलने वालों के लिए फॅुटपाथ की कोई व्यवस्था नहीं है और कहीं फुटपाथ बने भी है तो वहां पर फुटकर व्यवसायों का कब्जा है जो अपनी दुकाने वहां चला रहें है । गोलबाजार और शहीद पार्क वाले इलाकों को हम इसके मिसाल के तौर पर समझ सकते हैं । सबसे ज्यादा दुघर्टना को अंजाम देने में अगर कोई कारक है तो वह है बतरतीब पार्किंग की व्यवस्था जो आपको बैंक और अन्य कार्यालयों के नजदीक देखने को मिल ही जाएगी। यहां मेन रोड, संजय बाजार वाले पूरे क्षेत्र में और Bank of Baroda और Bank of India के नजदीक पर्किंग की व्यवस्था तो पूरी तरह बिगड़ चुकी हैं । उस पर दुकानों की होर्डिंग्स और डिस्प्ले इत्यादि इतने जरूरत से ज्यादा हैं । पुलिस कोतवाली के प्रांगण में लगा डिस्प्ले दुर्घटना को खुला आमंत्रण दे रहा है। क्योंकि पुलिस विभाग का ही कहना है नजर हटी -दुर्घटना घटी

ये भटकाने वाले डिस्प्ले बार्ड पर कौन लगाम लगाएगा?
इसके अलावा जो गोदामों और अन्य व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के लिए बड़ी गाड़िया बेधड़क शहर के अंदर घुस जाती है , इनका न तो कोई समय निर्धारित है और न ही जगह जिससे वे अनावश्यक ट्रेफिक जाम करते है, पुराने नरेन्द्र सिनेमा हाॅल, संजय मार्केट तथा मेन मार्केट में यह आलम प्रतिदिन देखने को मिलेगा। कायदे से बड़ी गाड़ियों का शहर के भीतर प्रवेश निषेध होना चाहिए! और अगर कोई घुस भी जाए तो उस पर सख्ती से कार्यवाही होनी चाहिए! इसके लिए online या स्पाट पे बिल का जुमाना लगाना अच्छा होगा।
जब किसी अधिकारी या नेताओं से मेरी औपचारिक अनौपचारिक चर्चा होती है तो अक्सर कहा जाता है कि नगर का बहुत विकास हुआ है। मेरे मन में ये कुछ चुभन सा लगता है । अखिर सवाल यह है कि ?

 

बस्तरिया बियर

यह एक प्रकार का मादक पेय है जिसे आम भाषा में ताड़ी भी कहते है आदिवासियों जीवन में सल्फी मादक पेय ही नहीं बल्कि सामाजिकता का प्रतीक भी है जानते है क्या खूबियां है इस पेय में

इस कारण से चित्रकोट जलप्रपात सूख गया

जानिए क्या कारण है चित्रकोट जल प्रपात सूख गया है चंद दिनांे में ही चित्रकोट में पानी देखने को
मिला ठीक वैसे ही जैसे यह आमतौर पर देखने को मिलता है। बस्तर के नियाग्रा फाल समझे जाने वाले इस चित्रकोट
जलप्रपात में हर साल काफी संख्या में पर्यटक आते है । इस बार पर्यटकों के साथ पर्यावरण प्रेमी भी चित्रकोट फाॅल के
इस रूप पर अचंभित थे जानिए क्या है वें
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मिला ठीक वैसे ही जैसे यह आमतौर पर देखने को मिलता है। बस्तर के नियाग्रा फाल समझे जाने वाले इस चित्रकोट
जलप्रपात में हर साल काफी संख्या में पर्यटक आते है । इस बार पर्यटकों के साथ पर्यावरण प्रेमी भी चित्रकोट फाॅल के
इस रूप पर अचंभित थे जानिए क्या है वें

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नदियों को सुखाना, जंगलों को नष्ट करना या नैसर्गिक सुन्दरता को खत्म करना ही विकास है।
गर्मियों में चित्रकोट की दुर्दशा तो सभी देख चुके हैं वो चित्रकोट जो गर्मीयों मंे भी पानी से लबालब हुआ करता था इस बार सूख गया । यानि दूसरे शब्दों में कहें तो यह विकास की भेंट चढ़ गया।
वैसे विकास को लेकर अभी कई बातें है जो दिमाग में आ रही है मगर वे सभी अगले अंक में

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