बस्तर में अनूठी होली

भारत त्योंहारों का देश है । इसमें हर त्योहार के पीछे कोई सबब है और सबब के पीछे एक कहानी है । ये तो सभी जानते है कि बस्तर के त्योहार देश के अन्य हिस्सों में मनाये जाने वाले त्योंहारो से भिन्न ही होते है । मिसाल के तौर पर जहां एक तरफ दशहरा पूरे विश्व में राम की रावण पर विजय की खुशी के लिए मनाया जाता है तो बस्तर में मनाये जाने वाले दशहरें का कुछ और ही कारण होता है ।

खैर अब एक और त्यौहार की बात करते है। जिसे हम होली यानि रंगों के त्योहार के नाम से जानते हैं । बस्तर में भी होली मनाई जाती है और होलिका दहन का अंदाज अलग होता है । आईए जानते है क्या।

माड़पाल की होलीः-

माड़पाल नामक गांव जिला मुख्यालय जगदलपुर और नगरनार के समीप है । यहां से उसकी दूरी महज 10 किमी है जो पूर्व की तरफ जयपुर रोड पर स्थित है। बात करते हैं होली की, बस्तर में होलिका दहन माड़़पाल की होलिका दहन के बाद ही मनाने की परंपरा है और इसमें राजपरिवार के सदस्य आज भी शामिल होते है। रियासत कालीन परंपरा अनुसार जिस अंगार को लेकर माड़पाल से जगदलपुर आता है उसी अग्नि से ही मावली मंदिर के मुख्य पुजारी होलिका दहन करते हैं । इससे पहले जग्गन्नाथ मंदिर से कृष्ण भगवान की डोली मावली मंदिर की परिक्रमा करती है। और होता है होलिका दहन

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इतिहासकारों के अनुसार इस परंपरा की शुरूआत 1408 में महाराजा पुररूषोत्म देव ने की थी जब वे जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे वहां एक वर्ष रहने के बाद जब वे लौटे तो उन्हें रथाधिपति या रथपति कहा गया। उनके लौटने पर माड़पाल में ग्रामीण बड़ी संख्या में उनके स्वागत के लिए जमा हुए और एक मेले आयोजन हुआ । जहां महाराजा ने होलिका दहन किया और इस परंपरा की नीव रखी और आज भी यही परम्परा का निर्वाह राजपरिवार के सदस्य कर रहें है।
और आज इसी वापसी के प्रतीक स्वरूप माड़पाल में होली मनाई जाती है।

कैसे होता है आयोजन :-

ग्राम माड़पाल में सुबह से ही उत्सव जैसा माहौल होता है। उड़िसा के अदिवासी नर्तक अपने दल के साथ प्रस्तुति देते हैं । और रात भर नाट-स्पर्धा चलती है । एक रथ का निर्माण किया जाता है जिसमें महाराजा सवार होकर पूरे गांव का भ्रमण करते हैं और ग्रामीणों का अभिवादन स्वीकार करते हैं । इस दौरान गांव को सजाया जाता है और अतिथयों का आदर सत्कार किया जाता हैं । महाराजा के साथ राजगुरू, राज ज्योतिष, राजपुरोहित, कुंवर परिवार, सभी राजपरिवार से जुड़े लोग शामिल होते है और होलिका दहन का कार्यक्रम किया जाता हैं । इस कार्यक्रम में माड़पाल के अलावा दो दर्जन से ज्यादा गांवों के ग्रामीण यहां जमा होते है और विशाल मेले का आयाजन होता है जिसमें चांदली, कोटपाड़, गिरला, धामानाहांडी और बोगिमा आदि गांव के लोग होलिका दहन में शामिल होने आते हैं ।
जगदलपुर के मावली मंदिर और सिरहासार के समीप जगन्ननाथ मंदिर की होली माड़पाल की होली के बाद ही जलाई जाती है। यानि माड़पाल की होली दुनियां में मनाई जाने वाली होली के एक दिन पहले ही होती है। कहा जाता है कि महाराजा पुरूषोत्म देव रात्रि विश्राम के लिए जगदलपुर रूके थे।
अन्य जगहों की होली है निराली माड़पाल होली की यह परंपरा बस्तर में 611 वर्ष पुरानी है ।

दंतेवाड़ा में होली 10 दिनों तक मनाए जाने का रिवाज है इस दिन क्योंकि कि इस त्योहार में अंचल के सभी देवी-देवता शामिल होने आते हैं और डाबरा मैदान में कलश स्थापना से इस त्योहार की शुरूआत होती है।फागुन मड़ई में कई रस्मों की अदायगी होती है।
ग्राम कलचा में इस दिन कोई रंग गुलाल नहीं खेला जाता है । मान्यता के अनुसार इस दिन सभी माड़पाल की होली में शरीक होते है परिणामस्परूप ग्राम कलचा खाली रह जाता है। यहां रंग पंचमी को रंग गुलाल खेल कर होली मनाई जाती है।
नानगुर का नाट इस त्योहार में काफी चर्चित होता है । यह होली का एक अन्य आकर्षण है। रामायण तथा महाभारत के प्रसंगों की जीवित कर कलाकार दर्शकां को रातभर बांधे रखते हैं । उड़िया,हल्बी तथा भतरी बोली में की जाने वाली इस नाट में विभिन्न वेश भूषाओं में कलाकार विभिन्न पात्रों को जीवित कर देते है। इसे देखने के लिए ग्रामीण दूर दूर से नानगुर गांव में आते हैं एवं रात भर नाट का कार्यक्रम होता है।

तो इस तरह से होती है यहां होली! कृपया अपनी प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स पर अवश्य दीजिए।

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Author: adji

4 thoughts on “बस्तर में अनूठी होली

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