बस्तर इतिहास की एक झलक :

आदिवासी अपना मानसिक कष्ट प्रायरू अंतिम सीमा तक सहन करने के अभ्यासी हैं. परन्तु अन्त में उनके अन्तस् अतरू कर्तव्य में विस्फोट आरंभ होता है. उनका मानसिक विस्फोट आरंभ हो गया है. उनके संवाद संवादपत्रों में प्रकाशित होने लगे हैं. अतएव कथा की अधविवृत्ति आवश्यक है.

अन्तिम कुल चालुक्यों का है

बस्तर के राज्य शासन का अन्तिम कुल चालुक्यों का है. चालुक्यों के प्रथम शासक अन्नमराज थे. अन्नमराज की परम्परा में अंतिम चार व्यक्तियों ने शासन किया. भैरमदेव, रूद्रप्रताप देव, प्रफुल्लकुमारी देवी तथा प्रवीरचन्द्र देव. प्रफुल्लकुमारी देवी रूद्रप्रताप देव की कन्या थीं. वे रूद्रप्रताप देव की एकाकी कन्या थी. रूद्रप्रताप देव की मृत्यु के पश्चात उन्हें यथाविधि चालुक्य कुल के राज्यशासन का अधिकार मिला था. शासन के द्वारा उनका विवाह मयूरभंज के राजकुमार प्रफुल्लचन्द्र भंजदेव से हुआ. प्रफुल्लचन्द्र भंजदेव यद्यपि प्रफुल्लकुमारी देवी के पति थे, तथापि राज्ञीं थीं प्रफुल्लकुमारी देवी. प्रफुल्लचन्द्र को राज्य की वृत्ति मात्र प्रदान की गई थी. राज्यशासन में उनका कोई अधिकार नहीं था. प्रफुल्लकुमारी देवी के दो पुत्र थे-प्रवीरचन्द्र देव तथा विजयचंद्र देव तथा उनकी दो कन्याएं थी-प्रफुल्लकुमारी देवी तथा गीता देवी. प्रफुल्लकुमारी देवी की मृत्यु के पश्चात यथाविधि चालुक्य कुल का राज्यशासन प्रवीरच्रद को प्रदान किया गया. प्रवीर के राज्यशासन में प्रफुल्लकुमार देव अर्थात भंज कुल का कोई अधिकार नहीं था. प्रवीरचंद्र देव यद्यपि प्रफुल्लचंद्र भंज देव के पुत्र थे, तथापि उन्हें भारतीय धर्म-विधान के अनुसार चालुक्य वंश में संयुक्त किया गया था. अवश्य विजयचंद्र देव भंज कुल के थे. उन्हें परंपरा-प्रथा के अनुसार प्रफुल्लचंद्र देव का उत्तराधिकार प्राप्त हुआ था.

दक्षिण का प्रारम्भिक इतिहास

वारंगल के नृपति प्रतापरूद्र काकतीय थे. उलुग खान ने उन्हें पराजित किया था और उन्हें बंदी रूप में दिल्ली भेजा था. रेड्डि रानी के अनितल्लि ताम्रपट्ट के अनुसार बंदी प्रतापरूद्ध काकतीय ने मार्ग में सोमोद्भवा नदी में अपने प्राण विसर्जित कर दिये थे. उनकी मृत्यु सन् 1324 में ई. हुई थी- चैदहवीं शताब्दी में. अन्नमदेव ने पन्द्रहवीं शताब्दी के आरंभ के पश्चात बस्तर का राज्यशासन आरंभ किया. काकतीय शिलालेखों तथा ताम्रपट्टों में उनका उल्लेख कहीं नहीं है. एक ऐतिहासिक ग्रंथ है- Early History of the Deccan उसमें काकतीय राजवंश के परिच्छेद में मुद्रित है कि प्रतापरूद्र की वंश परंपरा का कोई विवरण प्राप्त नहीं हुआ है तथापि उसमें अंतिम प्रकरण में मुद्रित है कि अवश्य प्रतापरूद्र के एक भाई अन्नमदेव थे, जिन्होंने बस्तर में राज्यशासन किया. किंतु यह उल्लेख सर्वथा अप्रमाणिक है. प्रतापरूद्ध काकतीय की मृत्यु के एक सौ वर्षों से अधिक व्यतीत हो जाने के पश्चात अन्नमदेव का उद्भव कैसे सम्भावित है?

प्रतापरूद्र काकतीय की प्रशस्ति से युक्त एक समसामयिक अलंकार ग्रंथ है-प्रतापरूद्ध यशोभूषण. ग्रंथ की एक संक्षिप्त पुस्तक भी प्रकाशित है-प्रतापरूद्रीयम्, उनमें मुद्रित है कि प्रतापरूद्र रघुवंश-जात हैं. परंतु प्रतापरूद्ध काकतीय के कार्पस इंस्क्रिप्शनम् में पुनरू पुनरू उत्कीर्ण है कि विधाता ने समुद्र-फेन के समान उज्जवल चतुर्थ कुल में काकतीयों को जन्म दिया. वे चतुर्थ जाति के हैं. तदनुसार अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ में भी उल्लेख है कि वे चतुर्थ-जाति अर्थात शुद्र कुल में उत्पन्न हुए हैं. इस ग्रंथ की संज्ञा- The Struggle for Empire है.
दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर में दो उत्कीर्ण शिलालेख सुरक्षित हैं. उनमें से एक अशुद्ध संस्कृत भाषा का है औरएक हिंदी का. दोनों में उत्कीर्ण है कि प्रतापरूद्ध काकतीय तथा उनके भाई अन्नमदेव दिल्ली, मथुरा में राज्य करते हुए वारंगल पहुंचे और उन्होंने वहां अपना राज्य शासन स्थिर किया. परंतु यह उल्लेख कहीं नहीं मिलता अर्थात उल्लेख अर्थविहीन और नितांत अशुद्ध है. ताम्रपट्टों में अंकित है कि अन्नमदेव वारंगल के पश्चात बस्तर आकर राज्यशासन करने लगे. वे पांडू-वंशी थे. इस प्रकार अन्नमदेव के वंश का उल्लेख रघुवंशी काकतीय तथा पांडू-वंशी हुआ. परंतु इन तीनों वंशों का अंध-प्रयोग हुआ है. वस्तुतरू राजकीय अभिलेखों तथा प्रचलित प्रमाणों से सिद्ध है कि वे चालुक्य वंशजात थे. प्रतीत होता है कि बस्तर के प्राक्तन एडमिनस्ट्रेटर डब्ल्यू. व्ही. ग्रिग्सन ने अपने ग्रंथ-दि माडिया गोन्ड्स आफ बस्तर में शिलापट्टों की अनुगति से अन्नमदेव को काकतीय मान लिया है तथा उनकी अनुगति में बहुल संज्ञा के प्रलोभन में प्रवीर ने प्रवीरचंद्र भंजदेव काकतीय संज्ञा का प्रयोग आरंभ कर दिया, जो प्रामाणिक है. प्रवीर परंपरा-जात अपने इतिहास के ज्ञाता नहीं थे. इतिहासज्ञों अथवा प्रशासन ने भी इस विषय में कोई चिंतन-मनोनयन नहीं किया.-वह चाहे रघुवंश हो, चाहे काकतीय हो, चाहे पांडू हो अथवा चालुक्य हो. ऐसा प्रतीत होता है कि छिन्दक नागवंश के बस्तर में राज्यशासन के पश्चात यह समस्त अंचल नृपत्ति-शून्य हो गया था. बस्तर के आदिवासी निवासी अपने ग्रामों तथा परगनों में माझी-चालकी तथा सदस्य आदि निर्वाचित कर लेते थे तथा खेती-पाती की व्यवस्था करते थे. प्रतीत होता है कि उन दिनों राजस्व एकत्र करने की व्यवस्था की आवश्यकता नहीं थी. अन्नमदेव के राज्यशासन की अवधि में उनके शासन के केन्द्रों में उनकी कोठियां थीं, जिनमें ग्रामवासी अपनी उपज का एक अंश जमा करने लगे थे. यह प्रथा सम्भवतरू अंग्रेजों के राज्यशासन आरंभ करने की अवधि तक चली आई. ग्रामवासी राजकेन्द्र में अपनी सुविधा तथा पर्वों के समय उपस्थित होकर नृपति के दर्शन करते थे तथा अपनी शक्ति के अनुसार उन्हें भेट के रूप में धन दे आते थे. राजाओं की आर्थिक स्थिति यत्समान्य थी. उनके निवास यद्यपि प्रशस्त थे तथापि वे मिट्टी तथा छप्परों से निर्मित थे. अंग्रेजों के अधिकार की अवधि से राजस्व प्रदान की विधि आरंभ हुई अन्नमदेव के आगमन के पश्चात विभिन्न स्थानों में उक्त प्रकार के निवास भवन निर्मित हुये थे. भैरमदेव की अवधि में जगदलपुर का राज भवन निर्मित हुआ. उसके निर्माण तथा अर्थ-व्यय में आदिम प्रजातियों का सहयोग सम्मिलित था.
राज-महल के निवास, शयन आदि के कुछ कक्षों के द्वार आवश्यकतानुसार खोले तथा बंद किये जाते थे. वे नृपतियों के परिवार के निमित्त एकाकी थे. महल के शेष समस्त परिसर तथा महल के शेष द्वार खुले रखते थे. आदिम प्रजातियों की संख्या निर्भीक रूप से उनमें प्रवेश पूर्वक, उनके परिदर्शन के निमित्त स्वच्छल थी.

बस्तरिया बियर

यह एक प्रकार का मादक पेय है जिसे आम भाषा में ताड़ी भी कहते है आदिवासियों जीवन में सल्फी मादक पेय ही नहीं बल्कि सामाजिकता का प्रतीक भी है जानते है क्या खूबियां है इस पेय में

इस कारण से चित्रकोट जलप्रपात सूख गया

जानिए क्या कारण है चित्रकोट जल प्रपात सूख गया है चंद दिनांे में ही चित्रकोट में पानी देखने को
मिला ठीक वैसे ही जैसे यह आमतौर पर देखने को मिलता है। बस्तर के नियाग्रा फाल समझे जाने वाले इस चित्रकोट
जलप्रपात में हर साल काफी संख्या में पर्यटक आते है । इस बार पर्यटकों के साथ पर्यावरण प्रेमी भी चित्रकोट फाॅल के
इस रूप पर अचंभित थे जानिए क्या है वें
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अवधियां परिवर्तित होती हैं. अंग्रेजी राज्यशासन की अवधि में देश का स्वाधीनता आंदोलन आरंभ हुआ. यह आंदोलन अंत में साफल्यमंडित हुआ. अंग्रेज हमारा देश छोड़ कर चले गये. तब देश के सम्मपूर्ण निवासियों को स्वाधीन करने तथा जनतंत्र आरंभ करने के उद्देश्य से देश के समस्त नृपतियों के शासनों का अंत हुआ. देश जनतांत्रिक हो गया. नृपतियों को जनतांत्रिक शासन के द्वारा अपेक्षित सुविधाएं प्रदान की गई. उक्त अवधि के अभिलेख पठनीय हैं.
बस्तर की आदिम जनसंख्या अपने नृपतियों का सम्मान देवताओं के समान करती आई है. आदिमप्रजातियों ने विजयोत्सव के अवसर पर सर्वदा नृपतियों के सम्मुख उनकी कठिन आलोचनाएं की है तथापि उनका सम्मान भी किया है. प्रवीरचंद्र देव के महल से स्वर्ण-रत्नों आदि की चोरी हो गई थी. अतएव आदिवासियों की बहुल संख्या ने शासन से इस विषय में कठिन आलोचना-विवेचना की और अंत में वे एक सप्ताह-व्यापी धरने पर बैठे. यह धरना जिलाअधिकारी के कार्यालय प्रांगण में हुआ था. प्रवीर तथा प्रशासन की गतियों में परस्पर विरोध उत्पन्न था. अतएव आदिमप्रजातियां भी प्रशासन के कार्य-कलाप की विरोधी हो गई थी. दुर्भाग्यवश राज-महल में एक दिन आदिम-प्रजातियों तथा प्रवीर के सहित संघर्ष आरंभ हुआ , जिसमें आदिम प्रजातियों की संख्या के सहित प्रवीर का भी वध हो गया.

प्रवीर इस घटना के पहले शासन-प्रशासन की अपने सम्पर्क की व्यवस्थाओं के विपरीत थे. शासन को प्रवीर की गतिविधियों का शासन के प्रति वैपरीत्य का संवाद मिला। प्रवीर केन्द्रीय शासन के अधिपति प्रधानमंत्री के सम्मुख निमंत्रित किये गये अंत में प्राक्तन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें उनके व्यक्ति अधिकारों से विरत कर दिया. जनतंत्र आरंभ होने के समय बस्तर राज्य की संपत्ति आदि के विषय में, प्रवीर के बंदी होने के समय जो अभिलेख एकत्र हुए उन सबका मनोनयन अनिवार्य आवश्यक है.

बस्तर इतिहास की एक झलक

नृपति प्रवीर ने अपने लघु भ्राता विजयचंद्र देव के निवास के निमित्त एक भवन निर्मित कर दिया था, जिसमें आजकल किराये पर लिया गया मानव विज्ञान सर्वेक्षण का वृहत संग्रहालय है. उपर्युक्त पंक्तियों से स्पष्ट है कि विजयचंद्र भंजदेव मयूरभंज में स्थित अपने पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी थे तथा प्रवीरचंद्र देव अपने राज्यशासन की समस्त संपत्ति के अधिकारी थे.
जनतंत्र की अवधि में एक दुर्योगी घटना घटित हुई तथा केन्द्रीय प्रधान मंत्री ने उनके महल तथा उनकी सम्पत्ति से उन्हें विलग कर दिया. शासकीय आदेश का यह अभिलेख का विवरण तथा उसके औचित्य-अनौचित्य एवं अधिकार-अनाधिकार के विषय ज्ञात करना अनिवार्य प्रतीत होता है. इस घटना के पश्चात भी प्रवीरचंद्र भंजदेव तथा अपने परिवार के सहित संपूर्ण राजमहल में निवास करने लगे. दुर्योगवश विजयचंद्र भंजदेव का भी निधन हो गया. उनके पश्चात उनके पुत्र भरतचंद्र भंजदेव ने महल तथा राज्य की अधिकांश संपत्ति भूमि और सब कुछ आयत्त कर दिया. प्रवीरचंद्र देव की राज्ञी को शासन ने महल से भिन्न एक भवन किराये पर निवास के लिये दे दिया, जिसमें वे अब तक कठिन रूग्णावस्था में अपना कठिन जीवन व्यतीत कर रही है.
भरतचंद्र भंजदेव तथा उनकी पत्नी के द्वारा राज-महल का अनेकांश विक्रय कर दिया गया है अथवा लीज पर नागरिकों को दे दिया गया है. इस प्रकार बस्तर राज्यशासन की एकमेव स्मृति का राज-महल सर्वथा नष्ट-विनष्ट हो गया है.
जगदलपुर नगर यद्यपि नित्य अधिकधिक प्रसारित होता जा रहा है तथापि जनतंत्र की आरंभि के पश्चात उसका रूप भी नष्ट-विनष्ट हुआ है. जगदलपुर के सरोवरों की प्रायरू इतिश्री हो गई है. उसके स्थल विक्रय कर दिये गए हैं. यह सब दृष्य नूतन नागरिकों के पक्ष में अज्ञात तथा आधार-विहीन हैं. परंतु पुरातन नागरिक संख्या उन तमाम दृष्यों, विशेषतरू राजमहल की विनष्ट गति-स्थिति सहन नहीं कर पा रही है तथापि यह आश्चर्यजनक है कि वह प्रायरू मौन, निस्पंद है. अवश्य बस्तर मंडल के आदिम निवासियों ने अपने मानसिक कष्ट का उद्घोष व्यक्त करना आरंभ कर दिया है.
शासन के द्वारा उक्त परिस्थतियों तथा उनका निवारण के तथ्य गंभीर रूप से विचारणीय है.
यह निरूसंशय है कि विजयचंद्र भंजदेव की संतति राज-महल के विषय में सम्पूर्ण रूप से उत्तरदायी है.
आदिमप्रजातियों तथा प्रबुद्ध नागरिकों की धारणा है कि राज-महल में मानव विज्ञान सर्वेक्षण का संचालनालय तथा पुरातात्विक संग्रहालय स्थापित किया जाए. राजमहल के स्थलों का प्रयोग कबूतर-खानों के समान नहीं, उसकी चिरकालिक स्मृति के समान किया जाये. यह आयोजन प्रागैतिहासिक बस्तर के अर्थ में अत्यंत शोभन होगा. बस्तर-दंडक वन का प्रमुख अंचल है. बस्तर की आदिप्रजातियां अंचल के गौरव हैं-उनकी रक्षा की जाए.
उपर्युक्त पंक्तियों के पुनर्लेखन से यह स्पष्ट है कि प्रवीरचंद्र देव के समस्त राजकीय अधिकार-अनाधिकार, विजयचंद्र भंजदेव तथा उनके परिवार के द्वारा राजमहल के भवन तथा उसकी भूमि, उसकी चतुरू सीमा के विनाश, विपुल-संख्यक आदिमप्रजातियों के विशाद-मूलक आग्र्रह, राजकीय स्मृति के सांस्कृतिक विस्फोट, परंपरा से बसे मानव समाज की अंतर्वेदना आदि के विश£ेषण-विवेचन आदि के पश्चात यह समीचीन प्रतीत होता है कि राजमहल में नवनिर्मित निवास तथा व्यापार-गृह आदि, समस्त विश्रृंखल कृत्यों को विनष्ट किया जाये, राजमहल में बस्तर की सांस्कृतिक रक्षा के नियमित मानवशास्त्रीय संग्रहागार भाटक-विहीन भवन तथा स्थल प्रदान किया जाये, उसमें पुरातात्विक संग्रहालय स्थित किया जाये, संग्रहालय की सम्मुखीनय भूमि को उसकी मूर्तियों से सज्जित किया जावे, उपलब्ध समस्त शिलालेख, ताम्रपट्ट आदि से अलंकृत किया जाये. राजमाता नगर के एक सरकार भवन के ऊपरी खंड में वर्षों से अस्वस्थ पड़ी है. वे उठ-बैठ नहीं पातीं. उन्हें राजमहल में सुविधामूलक निवास प्रदान किया जाये. उनका जीवन संदिग्ध हो गया है. उनके खुले निवास, उनकी चिकित्सा आदि से उन्हें आराम प्रदान किया जाये. राजमहल की दीवारें निर्मित की जायें. नवनिमार्ण का अर्थव्यय भंज परिवार सहन करे.
उदात्त तथा समीचीन चिंतन के सहित भंज परिवार विजय-भवन में निवास आरंभ करें. इतना ही केवल नहीं, भंज परिवार के वरिष्ठ व्यक्ति अपने द्वारा विक्रीत स्थानों का लेखा-जोखा शासन को प्रदान करें.
राज्यशासन तथा राज परिवार को अपने प्राणदान का मूल्य देकर प्रागैतिहासिक युग के आदिवासियों ने सम्मानित किया है. अतएव उनका मानसिक शमन किया जाये. भंज परिवार ने चालुक्य नृपतियों का असीम लाभ उठाया है. अब वे चालुक्य कुल का इतिहास प्रशस्त करें.
जनतांत्रिक शासन-प्रशासन का भी एकान्त कर्तव्य है कि वे इस विषय में अपना सक्रिय कर्तव्य पालन करें.

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Author: adji

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