भारत छोड़ आंदोलन का इतिहास

77 साल पहले ‘करो या मरो’ के नारे के साथ महात्मा गांधी ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का फैसला लिया। 8 अगस्त 1942 की शाम को बम्बई में कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन का प्रस्ताव पास किया गया। अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर करने में इस आंदोलन का बहुत बड़ा हाथ था।

 

आठ अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान पर अखिल भारतीय काँग्रेस महासमिति ने वह प्रस्ताव पारित किया था, जिसे ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव कहा गया। सन् 1885 से राष्ट्रीय काँग्रेस अनेक प्रस्ताव स्वीकार करती रही थी और ऐसा भी नहीं था कि इन प्रस्तावों के कोई परिणाम नहीं निकलते थे। लेकिन ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव एक ऐसा प्रस्ताव था जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक विशिष्‍ट मोड़ दिया, इस प्रस्ताव ने तो जैसे सारा राजनीतिक माहौल ही बदल डाला। सारे देश में एक अभूतपूर्व उत्साह की लहर दौड़ गई। लेकिन उस उत्साह को राष्‍ट्रीय विस्फोट में बदल दिया उस रात राष्‍ट्र के प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी ने। तत्कालीन गोरी सरकार के इस कदम की जो तीव्र प्रतिक्रियाएँ हुई, वह सचमुच अभूतपूर्व थी

बापू ने इस आंदोलन की शुरुआत अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के मुंबई अधिवेशन से की थी। अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस ने 4 जुलाई, 1942 को एक प्रस्‍ताव पारित किया था। शुरू में तो इस प्रस्‍ताव को लेकर पार्टी में काफी मतभेद थे। पार्टी नेता सी राजगोपालाचारी ने पार्टी छोड़ दी। मगर नेहरू और मौलाना आजाद ने बापू के आह्वान पर अंत तक इसके समर्थन का फैसला किया

बापू ने दिया करो या मरो का नारा
महात्‍मा गांधी और उनके समर्थकों ने अंग्रेजी हुकूमत से स्‍पष्‍ट रूप से कह दिया कि वह द्वितीय विश्‍वयुद्ध के प्रयासों का तब तक समर्थन नहीं करेंगे जब तक भारत को पूरी तरह से आजादी नहीं मिल जाती। बापू ने करो या मरो के नारे के साथ सभी देशवासियों से अनुशासन बनाए रखने की भी अपील की।

गांधी को कर दिया गया नजरबंद
आंदोलन की शुरुआत होते ही कांग्रेस वर्किंग कमैटी के सभी सदस्‍यों को गिरफ्तार कर लिया गया। इतना ही नहीं अंग्रेजों ने कांग्रेस को गैर सरकारी संस्‍था भी घोषित कर दिया। यहां तक कि बापू को भी अहमदनगर किले में नजरबंद कर दिया गया।

अहिंसा के आंदोलन में मारे गए सैकड़ों
अहिंसा के इस आंदोलन में अंग्रेजी शासन की निर्ममता के चलते करीब 940 लोग मारे गए थे। वहीं 1630 घायल भी हुए थे। 60 हजार से अधिक कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारी भी दी। अंग्रेजी हुकूमत के दस्तावेजों के मुताबिक अगस्त 1942 से दिसंबर 1942 तक पुलिस और सेना ने प्रदर्शनकारियों पर 538 बार गोलियां चलाईं।

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देश को एकजुट कर गया यह आंदोलन
भले ही बापू के इस आंदोलन को आंशिक रूप से ही सफलता मिली हो लेकिन इस आंदोलन ने पूरे देश को एकजुट कर दिया। 1943 के अंत तक सारा देश संगठित हो गया। अंत में हार मानकर ब्रिटिश सरकार ने संकेत दे दिया कि सत्ता हस्तांतरण कर उसे भारतीयों के हाथ में सौंप दिया जाएगा। तब जाकर गांधी जी ने आंदोलन को बंद कर दिया। उसके बाद कांग्रेसी नेताओं सहित लगभग 100,000 राजनैतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया।

दरअसल सन् 1942 की क्रांति पिछले सत्तावन वर्ष से राष्‍ट्रीय काँग्रेस जो आंदोलन चला रही थी, उसका उफान था। इस उफान ने अँग्रेजों की आँखें खोल दी। इस उफान की पृष्ठभूमि में लोकमान्य तिलक और उनके बाद महात्मा गाँधी ने जो व्यापक जन-जागृति उत्पन्न की थी, जो राष्ट्रीय चेतना जगाई थी, वह थी। लिहाजा, सन बयालीस के सिर्फ पाँच साल बाद ही भारत स्वतंत्र हो गया। निश्चय ही इसके साथ विभाजन की ह्रदय विदारक त्रासदी भी जुड़ी थी, फिर भी यह तथ्य तो स्पष्ट है ही कि ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन ने अँग्रेजों के समक्ष स्पष्ट कर दिया था कि उनकी हुकूमत चल नहीं सकती।

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Author: adji

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