Food When and How to eat?

भोजन तो हम सभी करते है और कई प्रकार के भोजन हमारे शरीर में प्रतिदिन जाते हैं । यह भी सच है कि भोजन कई प्रकार के होते हैं । भोजन का मानव शरीर में क्या असर हो रहा है इसका निरंतर शोध वर्षाें से चला आ रहा है और आज भी अनवरत जारी है ।

आयुर्वेद के हिसाब से भोजन तीन प्रकार के होते हैं तामसिक, राजसिक और सादा।

सवाल यह उठता है कि किस प्रकार के भोजन को किस श्रेणी में रखा जाए। तो भोजन के बारे में चर्चा करते हैं ।

भगवत गीता में श्रीकृष्ण के 17वें अध्याय में श्लोक न. 8, 9 तथा 10 की व्याख्या देखेंगें तो सम्भवतः आपको भोजन के प्रकार और उसे पंसद किए जाने वाले वर्गो के बारे में पता चल जाएगा।
जानते हैं उसमें लिखा क्या है ?
ऐसे भोजन जो कड़वे,अम्लीय, नमकीन,तथा बहुत गर्म, तीखे सूखे या जलाने वाले होते हैं और जो पीड़ा या बीमारी उत्पन्न करते हैं – राजसी प्रकृति के लोगों को प्रिय होते हैं यानि कृष्ण का इशारा तैलीय, तली भुनी तथा मसाले दार भोजन की तरफ है जिसे आम तौर पर मंहगा या स्वादिष्ट माना जाता है। यह भी सच है कि इस प्रकार के भोजन ही बिमारी के कारक होते है याद कीजिए आजकल डाॅक्टर कहते है -ज्यादा तेल मसाला मत खाईए। इस प्रकार के भोजन शाकाहारी और मांसाहारी दोनों ही प्रकार के हो सकते है

गौर फरमाते है एक अन्य श्लोक पर जिसमें श्री कृष्ण भोजन के बारे में कहते है।

भोजन जो आधे पके हुए, स्वाद हीन बदबूदार बासी और प्रदूषित होते है और जो अशुद्ध भी होते हैं तामसी प्रकृति के लोगों को प्रिय होते है। यानि सीधा-सीधा    अधकच्चा बासी-भोजन जो हम एक दिन बना कर कई दिनों तक प्रयोग करते है। चाहे वे चावल दाल ही क्यों न हो। अगर घंटे भर के बाद नहीं खाया गया तो वह गुणकारी नहीं होता । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम इसी प्रकार के भोजन के आदी हो चुके है। यानि रात को बनाकर दख दिया सुबह गर्म करके या फ्रीज में रखकर खाते है। बासी से ताप्पर्य बिना पकाए हुए भोजन क्या कहें आज के डिब्बाबंद भोजनों को इन्हीं श्रेणी में रख सकते है।

एक अन्य श्लोक 8 में कहा गया है जो दीर्घ जीवन का आधार हों , बुद्धि, शक्ति, स्वास्थ्य,प्रसन्नता और प्रफुल्लता बढ़ाते हैं और रसदार, प्रिय,पुष्टि देने वाले और स्वभाव से रूचिकर होते हैं सात्विक प्रकृति के लोगों को प्रिय होते है। इसका तात्पर्य पकापकाया हुआ भोजन जिसे स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए खाया जाता है। दूसरे शब्दों में ताज़ा भोजन,शाकाहारी भोजन जिसमें प्रकृति के सारे गुण मौजूद हों तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से गुणकारी हों ऐसे ही भोजन सात्विक भोजन की श्रेणी में आते हैं ।

 

बस्तरिया बियर

यह एक प्रकार का मादक पेय है जिसे आम भाषा में ताड़ी भी कहते है आदिवासियों जीवन में सल्फी मादक पेय ही नहीं बल्कि सामाजिकता का प्रतीक भी है जानते है क्या खूबियां है इस पेय में

इस कारण से चित्रकोट जलप्रपात सूख गया

जानिए क्या कारण है चित्रकोट जल प्रपात सूख गया है चंद दिनांे में ही चित्रकोट में पानी देखने को
मिला ठीक वैसे ही जैसे यह आमतौर पर देखने को मिलता है। बस्तर के नियाग्रा फाल समझे जाने वाले इस चित्रकोट
जलप्रपात में हर साल काफी संख्या में पर्यटक आते है । इस बार पर्यटकों के साथ पर्यावरण प्रेमी भी चित्रकोट फाॅल के
इस रूप पर अचंभित थे जानिए क्या है वें
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तो इस प्रकार भोजन के तीन प्रकार होते है। जिन्हें अपने रूचि अनुसार लोग पंसद करते है ।सवाल यह है कि हम अपने शरीर के लिए कौन सा भोजन स्वीकार करते है। आज के समय में चिकित्सा सुविधा बड़ी सुलभ हो गई है जिसके आधार पर हम अपने भोजन का चुनाव कर सकते हैं ।

अब जानते है क्या खाना चाहिए ?

शरीर में यूरिक एसिड बढ़ने के साथ रक्तचाप बढ़ जाता है। और गठिया के दर्द भी बढ़ जाते हैं । यूरिक एसिड की मात्रा फलों, सब्जियों, दूध और पनीर में नगण्य होती है। मांस, मछली, हरी सेम आदि में 25 से 100 मिलीग्राम और मांस, सूप जिगर और सार्डिन fish में प्रत्येक 100 ग्राम के खुराक में 200 से 1000 मिलीग्राम यूरिक एसिड होता है।
तो रक्तचाप जिनका उच्च होता है उन्हें यूरिक एसिड वाले आहार से बचना चाहिए। स्थानीय रूप से पैदा किये गये खाद्य पदार्थाें का शरीर पर अधिक सकारात्मक प्रभाव पड़ता है । इसी प्रकार मौसमी उपज को अपने आहार में शामिल कीजिए काफी लाभ होगा ।  गर्मी में ठंडे तासिर वाले आहार और ठंड में गर्म तासिर वाले आहार का सेवन करिए। प्रकृति भी मौसम के हिसाब से उत्पादन करती है तो प्रकृति के साथ ही चलिए । जैसे आजकल गर्मी के मौसम आते ही तरबूज, आम काफी आते हैं । इनका खूब लाभ उठाईए। वैसे ही ठंड में संतरे, अंगूर इत्यादि काफी मात्रा में आते हैं ।इनका जरूर सेवन कीजिए। साथ ही मौसमी सब्जियों को लेना न भूलें

कितना खाना चाहिए? 

कहते है भोजन उतना ही कीजिए जितना आप मेहनत करते हैं । यानि जरूरत से ज्यादा भोजन आपके शरीर का वजन बड़ा सकती है और कई प्रकार के रोगों को आमंत्रित कर सकती है। इनसे बचना हो तो संतुलित मात्रा  भोजन करिए। अंग्रेजी में कहावत है पेटू अपनी कब्र अने दांतों से खोदता है।
उपनिषद कहता है– केवल भोजन सब जीवित प्राणियों के लिए सबसे अच्छी औषधि है। क्योंकि वे केवल भोजन के कारण अस्तित्व में आए हैं ।
वहीं भगवत पुराण कहता है जिस व्यक्ति में स्वाद इंद्रियों को वश में नहीं किया तो वह अपनी दूसरी इंद्रियों को वश में नहीं रख सकता है।

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कब खाएं ?

भोजन के समय के बारे में आयुर्वेद कहता है
जब मल-मूत्र विसर्जित हो चुके हों, तथा मन शांत हो , तत्व संतुलित हों, पेट हवा से मुक्त हों ज्ञानेंद्रियां कार्यकुशल है और भूख लगी हो – तभी भोजन करना चाहिए।
भोजन पर्याप्त मात्रा में दिन में केवल एक बार ही लेना चाहिए। अन्य भोजन छोटे या थोड़े होने चाहिए।
कठोर व्यायाम करने एक घंट के बाद ही भोजन करें
भोजन के दौरान पानी अगर बहुत जरूरी होतो एक घूंट भोजन अंदर डालने के लिए लिया जा सकता है। वहीं खाने के लगभग एक घंटे पहले व बाद में पानी न पीएं इससे शरीर को भोजन पचाने में सुविधा होती है।

इस प्रकार कहते है यह भोजन जीवन देता है तो यही भोजन जीवन ले भी लेता है ।
जितना आप भोजन करते है उसे पचाने के लिए उतनी ही मात्रा में शारीरिक क्रियाएं यानि व्यायाम जरूरी है।

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Author: adji

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