बच्चों को सिखाएं लाइफ स्किल

दरअसल होता यह है कि सुबह 8 घंटे स्कूल में पढ़कर आए बच्चे को फिर 4-5 घंटे की कोचिंग भेज देते हैं। जिंदगी की दौड़ का घोड़ा बनाने के लिए, असलियत में हम उन्हें चूहादौड़ का एक चूहा बना रहे हैं। नहीं सिखा पा रहे जीने का तरीका- खुश रहने का मंत्र…साथ ही नहीं सिखा पा रहे लाइफ स्किल। विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और शांतचित्त होकर जीवन जीने की कला नहीं सिखा पा रहे हैं ना और इसके लिए सिर्फ और सिर्फ हम पालक और हमारा समाज जिम्मेदार है।

मै यहां न्यूजीलैण्ड की शिक्षा पद्धति पर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हॅूं, जो प्राईमरी में ही सीखाया जाता है। वहां बच्चों को नर्सरी क्लास से

  • फस्टटेड से लेकर आग लगने पर कैसे खुद का बचाव करें…
  • फीलिंग सेफ फीलिंग स्पेशल ( चाइल्ड एब्यूसमेंट), पानी में डूब रहे हो तो कैसे खुद को ज्यादा से ज्यादा देर तक जीवित और डूबने से बचाया जा सके….

जैसे विषय हर साल पढ़ाए जाते थे। फायरफाइटिंग से जुड़े कर्मचारी और अधिकारी हर माह स्कूल आते थे। बच्चों को सिखाया जाता था विपरीत परिस्थितियों में डर पर काबू रखते हुए कैसे एक्ट किया जाए। ह्यूमन चेन बनाकर कैसे एक-दूसरे की मदद की जाए…..हेल्पिंग हेंड से लेकर खुद पर काबू रखना ताकि मदद पहुंचने तक आप खुद को बचाए रखें….(सबसे बेहतर प्राईमरी शिक्षा में न्यूजीलैण्ड को टाॅप 20 देशों की श्रेणी में रखा जाता है )

बच्चों को सिखाएं लाइफ स्किल

हम नहीं सिखा पा रहे यह सब….नहीं दे पा रहे बच्चों को लाइफ स्किल…विपरीत परिस्थितियों से बचना….हाल ही की ही घटना देखिए…हमारे बच्चे नहीं जानते थे कि भीषण आग लगने पर वे कैसे अपनी और अपने दोस्तों की जान बचाएं….नहीं सीखा हमारे बच्चों ने थ्री-G का रूल ( गेट डाउन, गेट क्राउल, गेट आऊट ) जो 3 साल की उम्र से न्यूजीलैंड में बच्चों को सिखाया जाता है, आग लगे तो सबसे पहले झुक जाएं…आग हमेशा ऊपर की ओर फैलती है। गेट क्राउल…घुटनों के बल चले…गेट आऊट…वो विंडों या दरवाजा दिमाग में खोजे जिससे बाहर जा सकते हैं, उसी तरफ आगे बढ़े, जैसा कुछ बच्चों ने किया, खिड़की देख कर कूद लगा दी… भले ही वे अभी हास्पिटल में हो लेकिन जिंदा जलने से बच गए। लेकिन यहां भी वे नहीं समझ पा रहे थे कि वे जो जींस पहने हैं…वह दुनिया के सबसे मजबूत कपड़ों में गिनी जाती है…कुछ जींस को आपस में जोड़कर रस्सी बनाई जा सकती है। नहीं सिखा पाए हम उन्हें कि उनके हाथ में स्कूटर-बाइक की जो चाबी है उसके रिंग की मदद से वे दो जींस को एक रस्सी में बदल सकते हैं…काफी सारी नॉट्स हैं जिन्हें बांधकर पर्वतारोही हिमालय पार कर जाते हैं फिर चोटी से उतरते भी हैं…वही कुछ नाट्स तो हमें स्कूलों में घरों में अपने बच्चों को सिखानी चाहिए।

सूरत हादसे में बच्चे घबराकर कूद रहे थे…शायद थोड़े शांत मन से कूदते तो इंज्युरी कम होती। एक-एक कर वे बारी-बारी जंप कर सकते थे। उससे नीचे की भीड़ को भी बच्चों को कैच करने में आसानी होती। मल्टीपल इंज्युरी कम होती, हमारे अपने बच्चों को। आज आपको मेरी बातों से लगेगा…ज्ञान बांट रहा हॅू..लेकिन  हादसे के वीडियो को बार-बार देखेंगे तो समझ में आएगा एक शांतचित्त व्यक्ति ने बच्चों को बचाने की कोशिश की। वो दो बच्चों को बचा पाया लेकिन घबराई हुई लड़की खुद को संयत ना रख पाई और ….

अच्छे से याद है, पापाजी कहते थे कभी आग में फंस जाओ तो सबसे पहले अपने ऊपर के कपड़े उतार कर फेंक देना, मत सोचना कोई क्या कहेगा। क्योंकि ऊपर के कपड़ों में आग जल्दी पकड़ती है।

जलने के बाद वह जिस्म से चिपक कर भीषण तकलीफ देते हैं…वैसे ही यदि पानी में डूब रही हो तो खुद को संयत करना…सांस रोकना…फिर कमर से नीचे के कपड़े उतार देना क्योंकि ये पानी के साथ मिलकर भारी हो जाते हैं, तुम्हें सिंक (डुबाना) करेंगे। जब जान पर बन आए तो लोग क्या कहेंगे कि चिंता मत करना…तुम क्या कर सकती हो सिर्फ यह सोचना।

जो बच्चे बच ना पाए, उनके माँ बाप का सोच कर दिल बैठा जा रहा है। मेरे एक सीनियर साथी ने बहुत पहले कहा था…बच्चा साइकिल लेकर स्कूल जाने लगा है, जब तक वह घर वापस नहीं लौट आता…मन घबराता है। उस समय मैं उनकी बात समझ नआई थी… अब समझ आया आप दुनिया फतह करने का माद्दा रखते हो अपने बच्चे की खरोच भी आपको असहनीय तकलीफ देती है…हिन्दी पाठ्य पुस्तक की कहानी याद आती है

जिसमें एक पंडित पोथियां लेकर नाव में चढ़ा था…वह नाविक को समझा रहा था ‘अक्षर ज्ञान- ब्रह्म ज्ञान’ ना होने के कारण वह भवसागर से तर नहीं सकता…उसके बाद जब बीच मझधार में उनकी नाव डूबने लगती है तो पंडित की पोथियां उन्हें बचा नहीं पाती। गरीब नाविक उन्हें डूबने से बचाता है, किनारे लगाता है। हम भी अपने बच्चों को सिर्फ पंडित बनाने में लगे हैं….उन्हें पंडित के साथ नाविक भी बनाइए जो अपनी नाव और खुद का बचाव स्वयं कर सकें। सरकार से उम्मीद लगाना छोड़िए … चार जांच बैठाकर, कुछ मुआवजे बांटकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। कुकुरमुत्ते की तरह उग आए कोचिंग संस्थान ना बदलेंगे। इस तरह के हादसे होते रहे हैं…आगे भी हो सकते हैं….बचाव एक ही है हमें अपने बच्चों को जो लाइफ स्किल सिखानी है। आज रात ही बैठिए अपने बच्चों के साथ…उनके कैरियर को गूगल करते हैं ना…लाइफ स्किल को गूगल कीजिए। उनके साथ खुद भी समझिए विपरीत परिस्थितियों में धैर्य के साथ क्या-क्या किया जाए याद रखिए जान है तो जहान है।

( गणपति सिराने ( गणपति विसर्जन) समय की एक घटना मुझे याद है। हमारी ही कॉलोनी के एक भईया डूब रहे थे…दूसरे ने उन्हें बाल से खींचकर बचा लिया…वे जो दूसरे थे ना उन्हें लाइफ स्किल आती थी….उन्होंने अपना किस्सा बताते हुए कहा था…कि डूबते हुए इंसान को बचाने में बचानेवाला भी डूब जाता है…क्योंकि उसे तैरना आता है बचाना नहीं…मुझे मेरे स्विमिंग टीचर ने सिखाया है कि कोई डूब राह हो तो उसे खुद पर लदने ना दो…उसके बाल पकड़ों और घसीटकर बाहर लाने की कोशिश करो….यही तो छोटी-छोटी लाइफ स्किल हैं)

हमारे गृह नगर बस्तर में भी कच्ची उम्र में आत्म हत्या की खबर ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है। ऐसे कई उदाहरण देखने सुनने में आते हैं जहां महज एक विडियो गेम ने बच्चे की जान ले ली । कारण जानकार बताते है निराशा ही है । वे खेल में इतना रम जाते है उन्हें काल्पनिक दुनिया और हकीकत का ज्ञान नहीं होता है। ऐसे में स्कूल, परिवार और समाज की जिम्मेदारी बनती है कि बच्चों को लाईफ स्किल सीखाएं ।

आग से सुरक्षा के तरीके –

१. आग लगने पर तुरंत १०१ नंबर पर कॉल करके सूचना दें | यह न सोचें कि कोई दूसरा इसकी सूचना पहले ही दे चुका होगा |

२. आग लगने पर सबसे पहले इमारत की अग्नि चेतावनी की घंटी (फायर अलार्म) को सक्रिय करें | फिर बहुत जोर से “आग-आग” चिल्लाकर लोगों को सचेत करें | चेतावनी कम शब्दों में ही दें, नहीं तो लोगों को घटना की गंभीरता समझने में ज्यादा समय लग जायेगा |

३.आग लगने पर लिफ्ट का उपयोग न करें ,केवल सीढ़ियों का ही प्रयोग करें |

४.धुएँ से घिरे होने पर अपने नाक और मुँह को गीले कपडे से ढँक लें |

५. अगर आप धुएं से भरे कमरे में फँस जाएं और बाहर निकलने का रास्ता न हो ,तो दरवाजे को बंद कर लें ,और सभी दरारों और सुराखों को गीले तौलिये या चादरों से सील कर दें, जिससे धुआं अंदर न आ सके|

६.अगर आग आपकी अपनी ईमारत में लगी है ,और आप अभी फ़से नहीं हैं तो पहले बाहर आएं और वहीं रूककर १०१ नंबर पर अग्निशमन सेवा को घटना की सूचना दें |

७.अपने घर और कार्यालय में स्मोक (धुआं) डिटेक्टर अवश्य लगाएं क्योकि अपनी सुरक्षा के उपाय करना सदैव ही बेहतर और अच्छा होता है|

८.निश्चित अंतराल पर इमारत में लगे फायर अलार्म, स्मोक डिटेक्टर, पानी के स्त्रोत ,सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली , अग्निशामक की जांच करवाते रहें |

९.अपने आस पास लगे अग्निशामक की तारीख जांच लें| ध्यान दें की समय समय पर उसकी सर्विसिंग हो और उसमे आग बुझाने वाले गैस अथवा केमिकल को बदला/भरा जाए|

१०. अग्निशामक यन्त्र का प्रयोग कब और कैसे करना है ,इस बारे में अवश्य जाने और लोगों को भी इसकी जानकारी दें|

११.इमारत की समिति को हर छह महीने में अग्निशमन अभ्यास कराना चाहिए| आपातकाल में एकत्र होने के स्थल (emergency assembly point) का भी निरिक्षण करना चाहिए |
१२.घटनास्थल के नज़दीक भीड़ न लगने दें ,इससे आपातकालीन अग्निशमन सेवा और बचाव कार्य में बाधा होती है | ऐसी स्थिति में १०१ पर कॉल करे और वहां से दूर हो जाए |
१३. यदि आपके कपड़ो में आग लग जाए तो भागे नहीं ,इससे आग और भड़केगी | जमीन पर लेट जाए और उलट पलट(रोल) करे| किसी कम्बल ,कोट या भारी कपडे से ढक कर आग बुझाएं|

१४.अगर आप आपातकालीन सेवा और अग्नि सुरक्षा में प्रशिक्षित नहीं हैं ,तो आग में फँसे लोगों को निर्देश न दें | ऐसा करके आप उन्हें भ्रमित या गुमराह कर सकते हैं ,जिससे किसी की जान भी जा सकती है|

१५.भारी धुंआ और जहरीली गैस सबसे पहले छत की तरफ इकट्ठा होती है, इसलिए अगर धुआं हो तो ज़मीन पर झुक कर बैठें |

अंत में

काश के हम वीडियो बनाने और देखने के बजाय ये सब सीखें और बच्चों को सिखाएं
पर हम भेड़चाल वाले हैं अफसोस जताकर अगले हादसे का इंतज़ार करते हैं कि इसे भूल सकें….

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Author: adji

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