दंतेवाड़ा का फागुन मेला।

होली के दौरान की मनाई जाने वाली दंतेवाड़ा की फागुन मंडई यानि फागुन मेला अपने आप में एक अनोखा आयोजन है जिसमें 500 देवी देवताओं को आमंत्रित किया जाता है ।

दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाडा
दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाडा

इन देवी देवताओं के साथ आए 1500 सेवकों को दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी मंदिर के पीछे शंखनी नदी के किनारे पण्डाल बनाकर ठहराया जाता है । धमशाला में भी इनकी आवासीय व्यवस्था रहती है मड़ई के दौरान विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रसतुत करने पहुंचे कलाकरों को भी यहीं ठहराया जाता है। देव छत्रों की सुरक्षा इन्हें लाने वाले भक्त स्वयं तथा चांदी से निर्मित छत्रों की सुरक्षा हेतु प्रलिस बल भी शक्तिपीठ परिसर में तैनात रहती हैं अंतमें पादुका पूजन का कार्यक्रम सम्पन्न हो जाने के पश्चात लोग रंग-गुलाल धूल, आदि खेल कर फागुन त्यौहार यानि होली मनाते हैं ।
त्रयोदशी की तिथि में दंतेवाड़ा की फागुन मड़ई अपनी चरमावस्था में पहुंच जाती है । छत्रों ,लाटों बेरकों, डंगइयों और पालकियों की सजधज के बीच देवी दंतेश्वरी  डोली निकाली जाती है।

गाली उत्सव

होली से पहले एक गाली उत्सव का आयोजन किया जाता है। इसमें कोई शब्द एक छोर से दूसरे छोर तक वातावरण को कोलाहल पूर्ण बनाए रखते है। भद्दे, अश्लील शब्दों का प्रयोग पूर्णतः निषिद्ध होता है और इनका प्रयोग करने वाले मर्यादा बनाए रखते हैं ।

आंवरामार कार्यक्रम

फागुन चतुदर्शी को आंवरामार का आयोजन किया जाता है। इस कार्यक्रम में दो दलों में बंटे वनवसियों के बीच आंवले की बौछारें होने लगती है ठीक उसी तरह जिस तरह से स्पेन में टमाटरों के बीच एक उत्सव मनाया जाता है। दंतवाड़ा में लोग एक दूसरे को आंवले के फल से प्रहार कर अपना और दर्शकों का मनोरंजन करते हैं । आयुर्वेद में आंवले का काफी महत्व है क्योंकि यह औषधिय गुणों से युक्त होता है , सम्भवतः इस उत्सव से आंवले की महत्ता बताई जाती है। इसी दिन देवी दंतश्वरी की पालकी नवीं बार निकाली जाती है।

बस्तर में फागुन मड़ई की शुरूआत महाशिवरात्रि के दिन से ही हो जाती है। देवी दंतेश्वरी मंदिर के सामने त्रिशूल स्थापना, गौ-पूजन किया जाता है। फागून माह के छठवें दिन नगर के मेनका डोबरा मंदिर में कलश स्थापना की जाती है तथा रानी तालाब यानि तरई में ताड़ के पत्तों को धोया जाता है।

सप्तमी तिथि

सप्तमी तिथि को खेर-खुंदनी का कार्यक्रम होता है इस कार्यक्रम में दंतेश्वरी की डोली के बहिर्गमन की शुरूआत होती है और अष्टमी को नृत्य संगीत का कार्यक्रम आयोजित होता है। इस कार्यक्रम में कलार और कुम्हार जातियों के लोग भाग लेते हैं ।
दंतेवाड़ा में 11 दिन तक चलने वाले फागुन मड़ई में 9 वें दिन होलिका दहन किया जाता है । यह होली बाजार मार्ग पर स्थित पुरानी सती-शिला के पास की जाती है जिसमें ताड़,बांस,फलाश, साल,बेर,चंन्दर और कनियारी की लकड़ियों की पवित्र होली जलाई जाती है। यह सती-शिला एक हजार साल पुराना है।

लोक कथा के अनुसार बस्तर की एक राजकुमारी ने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए स्वयं को अग्नि के हवाले कर दिया था। और यह होली उसी राजकुमारी की बलिदान की याद में जलाई जाती है । राजकुमारी की याद में मिट्टी एकत्र कर मंदिर के सिंह द्वार के सामने रखा जाता है। और उससे सेवादार और मंदिर समिति के सदस्य होली खेलते हैं।

ताड़फलंगा रस्म

इसमें एक रस्म होता है ताड़फलंगा
इस रस्म में पवित्र ताड़ पत्रों को सती-शिला के पास लाया जाता है और मंदिर के पुजारी होली की पूजा-अर्चना करते हैं । और चितलंका के पांच पण्डाल परिवार के सदस्य होली प्रज्वलित करते है। इन्हीं परिवारों की कुल देवी के नाम पर दंतेश्वरी सिंह द्वार के पास पांच पाण्डव मंदिर भी है ।
और होली के दूसरे दिन रंग-भंग उत्सव मनाया जात है जिसमें हर जाति धर्म के लोग सद्भावना पूर्ण रंगोत्सव मनाते हैं।
यहां इस त्योहार का मजा लेने विदेशी सैलानी भी दंतेवाड़ा आते हैं। और स्थानीय व्यापारी इस फागुन मड़ई में अपनी दुकाने लगाते है।

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Author: adji

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