Champagne of Bastar : सल्फी क्या है?

Salfi Tree Bastar

बस्तर जिले विभिन्न गांवों में हल्के नशे के लिए एक मादक पदार्थ लिया जाता है जिसमें दही सी खटास होती है। और इसे पीने के बाद एक नशा सा आ जाता है । यह पेय बस्तर जिले के हाट बाजारों में अक्सर देखने को मिल जाता है। इसे सल्फी कहते हैं ,जानते है क्या है सल्फी के बारे में ।


सल्फी क्या है?

एक प्रकार का रस है जो सल्फी के वृक्ष से प्राप्त होता है । यह वृक्ष कोरियोटा यूनेन्स कुल का वृक्ष है तथ अंग्रेजी में इसे फिश टेल पाॅम ट्री कहते है। इससे प्राप्त रस को सल्फी कहते है। शौकीन लोगों के बीच यह बस्तरिया बीयर के नाम से प्रसिद्ध है । एक सल्फी के वृक्ष की औसत आयु 70 वर्ष की होती है जिसमें 15 -20 वर्ष के बाद यह पेड़ रस यानि सल्फी देने लगता है। और लोग एक अनुष्ठान कर इसका रसावदन करते है।

क्या है रिवाज इसके लेने से पूर्व

ग्रामीण पहली बार जब सल्फी से रस लेते हैं तो बकायदा एक अनुष्ठान कर इसका रसास्वादन किया जाता है। इसके लिए ग्रामीण नौ कन्याओं का भोज कराते हैं। तथा पेड़ की पूजा की जाती है जिसमें पेड़ को भेंट स्वरूप चूड़ी, अंडा, लाली, नारियल चढ़ाया जाता है। एक सल्फी का वृक्ष एक परिवार को प्रतिदिन 100 रूपये की आमदनी देता है ।

क्योंकि प्रत्येक साप्ताहिक हाट बाजारों में खरीदारी के बाद ग्रामीण अनिवार्य रूप से इसका सेवन करते है। सल्फी वृक्ष की महत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब परिवार में संपत्ती का बंटवारा किया जाता है तो उसमें सल्फी के वृक्ष को भी गिना जाता है । आदिवासी समुदाय में प्रायः प्रत्येक परिवार का एक सल्फी वृक्ष होता है जिसे वह अपनी संपत्ती मानता है। तथा कन्या के विवाह में सल्फी वृक्ष जमाता को भेंट करने का भी रिवाज देखने में आता है। यह आदिवासी समुदाय के लिए एक पेय ही नहीं बल्कि समाजिकता का आधार है ठीक उसी तरह जैसे हमारे समाज में चाय एक सामाजिकता का आधार बना चुका है । चायपानी के लिए पूछना एक तरह से सम्मान की बात मानी जाती है।

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सल्फी वृक्ष की कुल अवधि

सल्फी पेड़ बस्तर ( फोटो-नरेश कुशवाहा)

एक सल्फी वृक्ष पूरी तरह से रस देने योग्य लगाये जाने के 15 से 20 साल के बाद ही बन पाता है। और एक सल्फी वृक्ष की आयु 70 वर्ष तक की होती है। यानि एक पीड़ी अगर इसका रोपण करती है तो उसके रस का स्वाद अगली पीड़ी तक लिया जाता है।

वैज्ञानिक आधार

सल्फी में खमीर होता है तथा इसमें अल्कोहल की मात्रा 7 से 10 प्रतिशत होती है । अगर इसे सीमित मात्रा में लिया जाए तो यह पेट संबधी रोगों के लिए यह दवा का काम करता है। विल फे्रड ग्रिकसन ने अपनी किताब Muriya: Gonds of Bastar  में इसके बारे में कहते हुए इसे Champagne of  Bastar कहा है। यह किताब का प्रथम संस्करण 1949 में छपी थी।

आदिवासी मान्यताएं

आदिवासी संस्कृति में सल्फी वृक्ष पूजनीय वृक्ष होता है। आदिवासियों के अनुसार यह छुई-मुई की तरह अतिसंवेदनशील है । खास बात यह है कि इसकी तुलना परिवार एक बेटी की तरह की जाती है । इसी लिए इस वृक्ष के नीचे झगड़ना, ऊॅचे स्वर में बात करना मना है। जब कोई खास व्यक्ति को सल्फी का पौधा दिया जाता है तो बकायदा बाजे,गाजे के साथ इसे सौंपा जाता है । ठीक उसी तरह जैसे कोई अपनी बेटी का विवाह कर किसी और को सौंपता है। और उम्मीद की जाती है कि वृक्ष बनने पर औरों का घर भी वह आबाद करे। यह परम्परा बस्तर जिले के कोंडागांव, नारायणपुर,अतांगढ़ फरसगांव आदि क्षेत्रों में काफी प्रचलित है।

सल्फी पेड़ बस्तर ( फोटो-नरेश कुशवाहा)

एक अन्य मान्यता के अनुसार सल्फी का रस केवल उसका स्वामी यानि पति ही ले सकता है और कोई इसका रस लेने की चेष्टा करता है तो वृक्ष सूख जाता है।

जिस तरह से लगातार कुछ इलाकों में सल्फी के पेड़ सूखते जा रहें है उस संबध में ग्रामीणों की मान्यता है कि गांव में होने वाले लगातार झगड़े एवं पारिवारिक कलह जिम्मेदार हैं।

जबकि कुछ ग्रामीण मानते हैं कि हरे रंग की कीट जब सल्फी के कोमल पत्तो पर अंडे देती है तो इससे उत्पन्न लाखों इल्लियां धीरे-धीरे तने के गर्त में हमला करती हैं और रस चूस लेती है। जिसकी वजह से पेड़ सूख जाते हैं । इसका इलाज जरूरी है।
जबकि एक वर्ग सल्फी पेड़ों को सिर्फ व्यवसायिक उद्देश्यों के लिए ही लगाता आया है।
कृषि वैज्ञानिक इस वृक्ष के संर्वधन की दिशा में लगतार लगे हैं। जबकि ग्रामीण छिंद के रस को इसका विकल्प मान कर इसे ले रहेें है। मगर इस बात का ध्यान रखा जाना जरूरी है

कि सल्फी के पेड़ आखिर गायब क्यों हो रहें है ?

क्या ग्रामीणों की दी गई दलील सही है या कोई वैज्ञानिक कारण है?

फिलहाल कृषि वैज्ञानिकों के पास इसका कोई जवाब नहीं है । मगर वे आशान्वित है कि इस दिशा में जल्द हो कोई ठोस कारण समझ में आ जाएगा।
क्या कोई संगठन इंद्रावती नदी बचाव आंदोलन की तरह सल्फी बचाव के लिए भी काम करेगा?

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Author: adji

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