नरूवा, गरुवा, घुरूवा, बाड़ी

एक समय था जब ग्रामीणजन अपने गांव-घर में बड़ी संख्या में गाय, भैंस, बकरी का संरक्षण और संवर्धन किया करते थे। उनके द्वारा परंपरागत जैविक खेती-किसानी की जाती थी। समय चक्र परिवर्तन एवं शहरीकरण के कारण ग्रामीण जनजीवन प्रभावित होने लगा था, जिस वजह से पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ने लगा। ग्रामीणजन अपने लोक परंपरा एवं जनजीवन से दूरी बनाने लग गये थे। खेती-किसानी से अनिच्छा, मजदूरों की किल्लत, महंगे बीज व रसायनिक खाद की उपयोगिता से ग्रामीण परिवेश पूर्ण रूप से बदल चुका था। लोग खेती-किसानी छोड़कर मजदूरी करने अन्य राज्यों में पलायन कर रहे थे। इस बदले तस्वीर को पुनः हरा-भरा करने एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समृद्ध और सुदृढ़ करने की परिकल्पना छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने देखी। उन्होंने प्रदेश के किसानों के हित में करोड़ों रूपए के ऋण माफी करने का ऐलान को सरकार बनते ही पूरा किया। इसके साथ ही धड़ा-धड़ अनेकों योजनाओं एवं फैसलों से प्रदेश की जनता के हित में कार्य कर रहे हैं।

नरूवा, गरुवा, घुरूवा, बाड़ी योजना क्या है?

राज्य सरकार की सबसे अहम महत्वाकांक्षी योजनाओं में नरूवा, गरुवा, घुरूवा, बाड़ी के माध्यम से कार्य योजना बनाई गयी है, जिसमें पुरखों के ज्ञान-विज्ञान की विरासत को बचाए रखने के लिए ग्रामीण परंपरा के रूप में संजोए रखने का प्रयास किया जा रहा है। इस योजना में बड़े बुजुर्गो एवं पुरखों के अनुभव एवं उनके विचारों से ग्रामीण परिदृश्य फिर से उपयोगी साबित होगी, जो पूरे गांव की तकदीर बदल देगी। इस योजना के लिए राज्य सरकार ने नारा दिया है- ‘‘छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी- नरवा, गरूवा, घुरवा और बारी, गांव ल बचाना हे संगवारी’’।
राज्य शासन द्वारा प्रदेश के गांवों को समृद्ध और खुशहाल बनाने के लिए नरवा, गरूवा, घुरवा और बारी की प्रमुख ‘‘सुराजी गांव योजना’’ बनाई गयी है। इस योजना से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ और सशक्त करने का प्रयास किया जा रहा है, इससे बहुत हद तक पर्यावरण संतुलन होगा। छत्तीसगढ़ सरकार नदी-नालों के पुर्नजीवन, गांव में पशुपालन और नस्ल सुधार, गोबर गैस और जैविक खाद जैसे कार्यों से गांव और किसानों को खुशहाल बनाने का प्रयास कर रही है। जैविक कृषि से लागत में कमी, आवारा पशुओं की खेतों में रोकथाम कर द्विफसलीय रकबा का बढ़ाना जा सकता है। इसके लिए नाला संवर्धन, गौठान निर्माण, जैविक खाद के उत्पादन एवं सब्जी एवं फलों की बाड़ी के उत्पादन से जोड़ने की योजना प्रारंभ की है। इससे आने वाले समय में जैविक खाद से फसल, सब्जियां, फल आदि उत्पादित किये जाएंगे। लोगों को मिलावट मुक्त खाने-पीने की वस्तुएं प्राप्त होगी। इस प्रयास से प्रदेश का पर्यावरण भी संतुलित हो सकता है।

शासन द्वारा कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने, स्थानीय संसाधनों को विकसित करने और व्यापक तौर पर पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर यह कार्यक्रम प्रारंभ किया गया हैं। पर्यावरण संतुलन, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, गिरता भू-जल स्तर, पशुधन संवर्धन, जैविक खेती जैसे विषय आज वैश्विक चिंता के कारक बने हुए हैं।

छत्तीसगढ़ को नयी पहचान 

इस महत्वाकांक्षी योजना में पायलेट प्रोजेक्ट से नरवा, गरूवा, घुरवा और बारी के माध्यम से छत्तीसगढ़ को एक नयी पहचान मिलेगी। इसके संरक्षण और विकास से ही गांवों में समृद्धि और किसानों को खुशहाली लाया जा सकता है। इस योजना में राज्य के पंचायत एवं ग्रामीण विकास, वन, कृषि एवं पशुधन विभाग को प्रमुख रूप से जिम्मेदारी सौंपी गयी है। साथ ही साथ पूरे प्रदेश में वृहद स्तर पर वृक्षारोपण भी किए जा रहे है। इस वृक्षारोपण के पश्चात् इसके संरक्षण करने के लिए भी जिम्मेदारी सौंपी गयी है। सुराजी गांव योजना से अनेक प्रकार से गौवंशी पशुओं के गोबर को घुरवा में एकत्रित कर जैविक खेती के माध्यम से पर्यावरण को भी संरक्षित किया जाएगा।
प्रदेश के ग्राम पंचायतों के क्षेत्रों में बनाए गए गोठानों में गांव के पशु पालकों द्वारा अपने पशुओं को लाया जा रहा हैं। गोठानों में पशुओं को चारा, पानी की समुचित व्यवस्था की गई हैं। वहीं पर पशुओं के ठहराव के लिए मचान और शेड बनाए गए हैं। इन गोठानों में पशुओं को खाते-पीते, विचरण करते, गोठानों में बने शेडों में विश्राम करते देखा जा रहा है। गोठानों में पशुओं की देखभाल, पशुओं के इलाज के भी इंतजाम किए गए हैं, पीने के पानी के लिए पानी टंकी हैं खाने के लिए पर्याप्त मात्रा में पैरा, घास और चारागाह बनाए जा रहे हैं। गोठानों में पेयजल के लिए सोलर पम्प स्थापित किए जा रहे हैं। वहां पर पानी, हरा चारा, छांव आदि की पर्याप्त व्यवस्था होने से मवेशी गोठान की ओर आकर्षित हो रहे हैं। गावों में चारागाह विकसित होने से जानवरों को पर्याप्त हरा चारा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होगी। सभी गोठान में स्थानीय चरवाहांे की नियुक्ति की जाएगी, जिसके लिए मानदेय की व्यवस्था भी गोठान की आमदनी से होगी।
प्रदेश के चयनित सभी नालों पर जल संरचनाओं के लिए स्टापडेम सहित अन्य संरचनाओं को विकसित किया जा रहा है। गांव-गांव में नदी-नालों के माध्यम से जल स्तर को बढ़ाने एवं कृषि क्षेत्रों में जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराये जाने हेतु उचित प्रयास किये जा रहे हैं। उद्यानिकी विभाग द्वारा प्रदेश के खासकर नदियों के किनारे वाले चयनित गांवों में बाड़ी विकास के काम किए जा रहे हैं। राज्य सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के मूर्त रूप लेने से गांव की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा और ग्रामीणों को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। कृषि विभाग द्वारा वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने के लिए वर्मीबेड तथा नाडेप टाका बनाए जा रहे हैं। वहीं पर गायों के गोबर से जैविक एवं कम्पोस्ट खाद के उत्पादन से कृषि उत्पादकता में काफी बढ़ोतरी होगी। प्रदेश में जैविक खेती के लिए गोबर खाद की बहुत मांग है। इस खाद को बेचकर अधिक आमदनी प्राप्त की जा सकेगी। इससे प्रदेश में जैविक खेती को भी काफी बढ़ावा मिलेगा। गोबर खाद के उपयोग से जमीन की ऊर्वरा शक्ति बढ़ेगी। इन प्रयासों से प्रदेष में हरित क्रांति, ष्वेत क्रांति एवं नील क्रांति में गति आयेगी।
अब समय दूर नहीं जब प्रदेश में किसानों की आया दुगुनी होती नजर आएगी। इस योजना से ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी साबित होगी और न्यूनतम निवेश में प्राकृतिक संसाधनों के उचित प्रबंधन से अधिकतम आर्थिक लाभ के अवसर उपलब्ध होंगे। योजना से लोगों को अधिक से अधिक रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। इन सभी प्रयासों से गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ राज्य का सपना साकार होता हुआ नजर आ रहा है। इन प्रयासों से किसान समृद्ध और खुशहाल होंगे तभी तो राज्य विकसित और समृद्धशाली बनेगा। ‘‘जय जोहार-जय छत्तीसगढ़’’

लेखक-तेजबहादुर सिंह भुवाल