बस्तर के मंडई और मेले

बस्तर के मंडई और मेले

मेला शब्द ‘ मिलन’ शब्द से बना प्रतीत होता है. मेला शब्द में एक रोमांच है. मेला होता तो है ही….. लगता, बैठता और भरता भी है. मेला ताजा और बासी भी हो जाता है और उठ भी जाता है, नई उमंग और जोश के साथ नए वर्ष में भरने के लिए. मेले में परिवेश की सघनता इतनी असरकारक होती है कि यहां का प्रत्येक व्यक्ति इन मेलों का होकर रह जाता है. मानव के प्रत्येक क्रियाकलापों पर उसकी संस्कृति की विशेषता की झलक मिलती है.

बस्तर के मंडई और मेले उल्लास के प्रतीक हैं. यहां मंडई का स्वरूप हाट-बाजार या मिलन स्थल ही नहीं होता बल्कि गांव-परगना, अंचल की अधिष्ठात्री देवी-देवताओं की पूजा का पर्व होता है. वर्ष भर जिसकी कृपा से जो कुछ भी प्राप्त हुआ उसके प्रति अगाध श्रद्धा-भक्ति के साथ प्रदर्शन और  देवी-देवताओं को उसका हिस्सा समर्पित करने का उत्सव ही मंडई है. बस्तर के मंडई-मेलों की तिथि के निर्धारण में, गॉंव के पुजारी का निर्णय सर्वमान्य होता है. देवी-देवताओं के वार के अनुसार शुभ मानते हुए, उस दिन-वार में मंडई का आयोजन किया जाता है. तिथि और वार निश्चित हो जाने के बाद ग्राम कोटवार के द्वारा साप्ताहिक बाजार में इसकी विधिवत घोषणा की जाती है. मंडई में शामिल होने के लिए आंचलिक देवी-देवताओं के साथ पुजारी और सिरहा को भी विधिवत आमंत्रण भेजा जाता है. आमंत्रण के दौरान देवी-देवताओं का विशेष ध्यान रखा जाता है. बस्तर के अधिकांश मंडई, ‘देव मंडई’ के रूप में जाने जाते हैं.

हाट-बाजार और मेला मड़ई जैसे जुड़ाव अपनी सप्तरंगी छटा के साथ अंचल की सांस्कृतिक सम्पन्नता के जीवन्त उत्सव हैं. बस्तर के ग्रामीण अंचलों में वर्ष भर साप्ताहिक हाट-बाजार तो लगते ही रहते हैं, किन्तु मेले और मंड़ई का महत्व ही कुछ और है। यह महत्व उनके लिए और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है जो दुर्गम और पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करते हैं. प्रकृति प्रदत्त असीम उपहार का आभार मानने और उस अज्ञात शक्ति की आराधना, ग्राम्य देवी-देवता, इष्ट देवता की उपासना में खो जाते हैं, यही नहीं वह अपने आस-पास बिखरी हुई प्रकृति की समस्त रंगीनियों को अपना सहचर बनाते हुए उनमें खो जाता है. फसल के कटाई के बाद बस्तर अंचल में मेले और मंड़ईयों का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है. बस्तर में मेले और मड़ईयों का अलग ही आनंद है. यहां मड़ई को ‘‘मंडई’’ कहा जाता है. बस्तर में आयोजित होने वाले मंडई के मूल में कोई न कोई अंत:कथा, संवेदना, लोक परम्परा है, यही कारण है कि इनके सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक स्वरूप में कोई बदलाव नहीं आया. अंचल में प्रचलित मेले मंडई वस्तुत: यहां की जीवन रेखाएं हैं. मंडई बस्तर की एक लोक-सांस्कृतिक परम्परा है. मंडई का आयोजन अधिकतर आस-पास के साप्ताहिक हाट-बाजारों के भरने के दिन ही आयोजित किया जाता है. मंडई के आयोजन की जानकारी हाट-बाजारों के माध्यम से आयोजन के पूर्व समीप के गांवों सेे, हाट-बाजारों में कोटवारों के द्वारा ‘‘हाका’’ के माध्यम से होती है. मंडई की प्रतिक्षा हर वर्ग को बड़ी बेसब्री के साथ होता है. हाका पडऩे के बाद मंडई जाने की तैयारी हर घर में होने लगती है. मंडई के आयोजन के लिए ग्रामवासी अपनी हैसियत के अनुसार धनराशि, चावल-दाल, इकठ्ठा कर लेते हैं. तैयारियों के साथ ग्रामवासियों में एक नये उत्साह का संचार होने लगता है – दूरस्थ अंचलों में बसने वाले ग्रामीण वर्ष में एक बार आयोजित होने वाले इस मेले में अपने सगे संबंधियों से हाल-चाल, सुख-दुख जानने उत्सुक होते हैं. किसी की मृत्यु का समाचार सुनकर रोते हैं. शादी का समाचार सिर में हल्दी डालकर दिया जाता है. दूर-दूर से आए हुए लोग अपने परिचितों, नाते-रिश्तेदारों को ढूंढते हैं. इस मेले में आये ग्रामीणों का उत्साह और उमंग शहरी कौतुहल का शिकार बनकर भी इस पर्व में जिस आनंद अनुभूति को प्राप्त करते हैं, वह केवल स्वाभाविक जीवन जीने वालों के ही नसीब में है. बस्तर के मेले-मंडईयों में आदिवासियों के संस्कृति की झलक देखने को मिलता है.

बस्तरिया बियर

यह एक प्रकार का मादक पेय है जिसे आम भाषा में ताड़ी भी कहते है आदिवासियों जीवन में सल्फी मादक पेय ही नहीं बल्कि सामाजिकता का प्रतीक भी है जानते है क्या खूबियां है इस पेय में

इस कारण से चित्रकोट जलप्रपात सूख गया

जानिए क्या कारण है चित्रकोट जल प्रपात सूख गया है चंद दिनांे में ही चित्रकोट में पानी देखने को
मिला ठीक वैसे ही जैसे यह आमतौर पर देखने को मिलता है। बस्तर के नियाग्रा फाल समझे जाने वाले इस चित्रकोट
जलप्रपात में हर साल काफी संख्या में पर्यटक आते है । इस बार पर्यटकों के साथ पर्यावरण प्रेमी भी चित्रकोट फाॅल के
इस रूप पर अचंभित थे जानिए क्या है वें
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                        मेला जैसे अवसरों के लिए साल भर मेहनत-मजदूरी करके कुछ रूपये इकठ्ठा किये जाते हैं, ताकि मेले का आनंद लिया जा सके. मेले के अवसर पर ग्रामीण युवतियाँ अपने श्रंृगार के प्रति भी सजग दिखाई देती हैं. सिर के बालों को पारंपरिक तरीकों से सजाती हैं, जिसे बाकटा खोसा, टेडग़ा खोसा, ढालेया खोसा, पंडकी खोसा अथवा लदेया खोसा कहा जाता है. इसी तरह कांटा, किलिप, फूलों से अपने बालों को संवारती सजाती हैं. कानों में तडक़ी, करनफूल, नाक में फूली, गले में नाहनु, चापसरी, खिपरी माला, धान खेड़ माला, मूंगा माला, हाथों और बांह में खाड़ू, अंयठी, ककनी, बांहटा, पांव में पंयड़ी, ढलवें पैसे और चांदी की पट्टी तथा हाथ की अंगुलियों में मुंदी की शोभा देखते ही बनती है। उत्सवों में सामान्यतया रंग-बिरंगी साडिय़ॉं पहनती हैं, किन्तु सौभाग्यशालिनी व सम्पन्न युवतियाँ बस्तर की सबसे बहुमूल्य साड़ी ठेकरा पाटा पहनती हैं, कंधों पर खूबसूरत ‘तुवाल’ रखती हैं. ग्रामीण युवक भी युवतियों के होड़ में पीछे नहीं रहते. वे भी कानों में बालियाँ, गले में खिपरी मालाएं, कंठी मालाएं, हाथों में खाड़ू और अंगुलियों में विभिन्न तरह की मुंदियों (अंगुठी) के साथ कंधों पर तरह-तरह के तुवाल (तौलिया) लटकाए रहते हैं. मेलों में विभिन्न तरह के देशी झुलों का आनंद लेते युवक-युवतियों को देखा जा सकता है. वहीं कुकड़ा मिठाई, लाई-चना, बीड़ा पान, लाड़ु, केला, चिवड़ा, गुडिय़ा खाजा, सरसतिया बोबो आदि पारम्परिक मिठाई-खाजा मेलों में सहज ही उपलब्ध रहता है. इन ग्रामीण मेलों में व्यापारी भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. युवतियों को छापे वाली ब्लाक मेंहदी और गुदना अपनी ओर आकर्षित करती है. सांझ ढलते ही उडिय़ा नाट, चईत परब, विभिन्न तरह के स्वांग और शिकार नृत्य रात भर लोगों को बांधे रखती है. मेले और मड़ईयों की रात ग्रामीणों के लिए रात्रि जागरण की रात होती है. इन अवसरों पर होने वाले नाट, नाटक, स्वांग, चइत-परब एवं अन्य उपलब्ध मनोरंजन के साधनों में ऐसे खो जाा है कि रात कब हुई और सवेरा कब हुआ, यह उसे मालूम ही नही पड़ता. मेला जहां एक ओर देवी-देवताओं के आगमन से प्रारंभ होता है तो दूसरी ओर देवी-देवताओं के विदाई, बलि के साथ होती है. लोग अपने और अपने परिजनों के लिए भरपूर खरीददारी करते हुए लौट जाते हैं फिर अगले वर्ष मेले में आने को, नई खुशी और उमंग के साथ.

बस्तर अंचल में दशहरा और गोंचा दो महापर्व हैं. इस महापर्व में शहरी और ग्रामीण जनता की भागीदारी एक दूसरे के पूरक होते हैं. इन महापर्वों में ग्रामीणों की भागीदारी महत्वपूर्ण होती है. विश्वप्रसिद्ध इन पर्वों का स्वरूप भी अन्य मेलों जैसा ही होता है. बस्तर अंचल में चर्चित मेलों में मावली मेला (नारायणपुर), कोंडागांव मेला, फागुन मेला (दन्तेवाड़ा), लिंगेश्वरी मेला (आलोर), रामाराम मेला (सुकमा), ईलमिड़ी, भंगाराम मेला (केशकाल) भद्रकाली मेला, चपका मेला, कांकेर मेला, धौड़ाई मेला, बस्तर मेला, करपावंड मेला, बकावंड मेला, गुमडा (छत्तीसगढ़-ओडि़सा सीमा), कचनार, माड़पाल, केसरपाल मेला, घोटपाल मेला, समलूर, बयानार, मर्दापाल, धनोरा, मर्दापाल, बारसूर मेला, चित्रकोट मेला, गुप्तेश्वर मेला (ओडि़सा), सकलनारायण मेला (भोपालपटनम) तुलार (बारसूर दन्तेवाड़ा) चिकटराज, जैतालूर (बीजापुर) आदि के अलावा आंचलिक मेला-मंडई में तीरथगढ़,  मावली पदर, चिंगीतरई, घोटिया, देवड़ा, मूली, जैतगिरी, गारेंगा, जैबेल, छोटेडोंगर, बड़ेडोंगर, अंतागढ़, केशकाल, फरसगांव, विश्रामपुरी, दुर्गकोंदल, पखान्जूर का नर-नारायण मेला, भानुप्रतापपुर, नरहरपुर, आसुलखार, कोरर, संबलपुर, गोविंदपुर, चारामा, हर्राडुला, सेलेगांव, जैतलुर आदि मेलों में आंचलिक जीवन की गहरी झलक मिलती है.

बस्तर के शैव स्थलों में शिवरात्रि के पूर्व पखवाड़े भर मेलों का आयोजन किया जाता है. राजशाही के जमाने में मेलों के बहाने पूरी रियासत एकत्रित हुआ करती थी. आधुनिकता के इस दौर में बस्तर के ऐतिहासिक महत्व के पारम्परिक मेला-मंड़ईयों ने महोत्सव का स्वरूप धारण कर लिया, जिनमें बारसूर महोत्सव, चित्रकोट महोत्सव, गढिय़ा महोत्सव आदि प्रमुख महोत्सव हैं. इन महोत्सव स्थलों में छत्तीसगढ़ शासन की ओर से मेलों के स्वरूप में और भी अधिक भव्यता प्रदान की जाती है.

फागुन मंडई – दन्तेवाड़ा जिला मुख्यालय धार्मिक दृष्टिकोण से प्रसिद्ध स्थल है. यहां शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम तट पर अंचल की आराध्या देवी मां दन्तेश्वरी का प्राचीन मंदिर स्थित है. दन्तेवाड़ा के इसी संगम स्थल पर दन्तेश्वरी माता के सम्मान में फागुन माह के शुक्ल पक्ष छठी से लेकर फागुन की समाप्ति तक तक मेला का आयोजन होता है. मांई दन्तेश्वरी को समर्पित फागुन मेला दक्षिण बस्तर का सबसे बड़ा मेला है. इस मेले में मांई दन्तेश्वरी तथा भैरम के अलावा सैकड़ों आंचलिक देवी-देवताओं का संगम तट पर समागम होता है, जिनकी पारम्परिक रूप से पूजा-आराधना, शोभायात्रा, पालकी दर्शन की जाती है. फागुन मेला का प्रमुख आकर्षण डंडार नृत्य, विभिन्न स्वांग नृत्य, शिकार नृत्य, (लमाहामार, गंवरमार, चितलमार, आदि) आंवलामार की रोमांचक दृष्य दर्शकों का खासा मनारंजन करती है. मेले के अंतिम पड़ाव में सती की याद में होलिका दहन की जाती है तथा होली के दूसरे दिन रंग-भंग का उत्सव मनाया जाता है, इस रस्म में एक दूसरे पर मिट्टी फेंक कर होली खेली जाती है. फागुन मंडई में आंचलिक देवी-देवता के अलावा सीमावर्ती राज्यों के देवी-देवताओं का भी आगमन होता है.

मावली मेला – बस्तर अंचल में मावली देवी के कई स्थानों पर मंदिर है. प्रमख रूप से दन्तेवाड़ा, जगदलपुर, नारायणपुर, मधोता, छोटे देवड़ा, कौड़ावंड, नवागाँव, सिवनी आदि गाँवों में मावली के मंदिर स्थापित हैं. नारायणपुर में मावली के नाम से विशाल मेला का आयोजन माघ महिने में शिवरात्रि के पूर्व सप्तदिवसीय होता है. बस्तर में मावली को कई नामों से पुकारा जाता है और उन रूपों में पूजा भी की जाती है. बस्तर अंचल में मावली के नाम से कई गाँव भी बसे हैं – मावली भाटा, मावली पदर, मावली गुड़ा आदि. मावली देवी के नाम से भरने वाली माघ महिने की मंडई नारायणपुर क्षेत्र में बसने वाले ग्रामीणों के लिए आस्था का केन्द्र है. रियासत काल से आयोजित होने वाले इस मेले में देशी-विदेशी पर्यटक यहां की संस्कृति को नजदीक से निहारने पहुंचते हैं.

लिंगेश्वरी मेला आलोर – वन स्थली ग्राम आलोर में लिंगेश्वरी मेला में शिव भक्ति के विभिन्न रूपों की स्थापना चौदहवीं शताब्दि से की गई है. यहां कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गुफा के अंदर विशेष पूजा-आराधना की जाती है. यह गुफा वर्ष में एक बार ही खोली जाती है.

रामाराम मेला – सुकमा जिला मुख्यालय से 9 किलोमीटर की दूरी पर फरवरी माह में आयोजित होने वाले मेला को रामाराम मेला के रूप में जाना जाता है. यह मेला तीन दिनों तक आयोजित होता है. पहाड़ की तलहटी पर चिटपिटिन देवी का मंदिर है. कहा जाता है कि चिटपिटिन देवी सुकमा जमींदारी की आराध्या देवी है. रामाराम मेले का आयोजन प्रारंभ से अब तक सुकमा जमींदारी से जुड़े देव परिवार के सदस्य ही करते हैं.

भद्रकाली मेला – महाशिवरात्रि के दिन इन्द्रावती और गोदावरी संगम नदी के तट पर भद्रकाली (भोपालपटनम) का मेला भरता है. संगम तट पर भद्रकाली का एक छोटा सा मंदिर स्थित है. कहा जाता है कि चालुक्य वंश के शासक बस्तर में राज्य की स्थापना की चाह लिए पहली बार प्रवेश किया था, तो भद्रकाली में मंदिर बनाकर कर देवी दन्तेश्वरी की पूजा आराधना की थी. यहां से दिव्य तलवार देवी से वरदान के रूप में प्राप्त हुआ था जिसके बल पर उन्होंने बस्तर में अपना राज्य स्थापित किया था.

सकलनारायण मेला – भोपालपटनम से बारह किलोमीटर दूर पोड़सपल्ली की पर्वत श्रृंखला स्थित है. इन्हीं पहाडिय़ों में तीन किलोमीटर मार्ग तय करके सकलनारायण गुफा पहुंचा जा सकता है. यहां प्रतिवर्ष चैत्र माह में सप्तदिवसीय मेला आयोजित होता है। गुफा के अंदर ईश्वरीय प्रतिमाओं का दर्शन होता है.

अंचल में मेले-मंडई अगहन महिने में पूर्णिमा की तिथि से केशरपाल मंडई से प्रारंभ होती है. तुलार गुफा में वर्ष में दो बार, महाशिवरात्रि तथा शरद्पूर्णिमा के समय तीर्थ मेला भरता है. यहां गुफा के अंदर शिव-पार्वती जी की प्रतिमा की पूजा की जाती है. चिंगीतरई, समलूर, चित्रकोट, गुप्तेश्वर, चपका, आदि स्थानों में महाशिवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है. कोण्डागांव का मेला माघ महिने में लगता है. माघ पूर्णिमा पर छेरकीन देवी तथा गंगादेई आदि देवी-देवताओं के सम्मान में बस्तर मंडई भरता है. इस अंचल में आयोजित होने वाले मेलों-मड़ईयों में देशी-विदेशी पर्यटकों, व्यापारियों, अध्येताओं, छायाकारों, रचनाकारों, फिल्मकारों आदि को अपनी ओर आकर्षित करने की ताकत रखती है. वस्तुत: बस्तर के मेले-मंडई का आनंद, सुनने-पढऩे के बजाय देखने में ज्यादा है.

 रूद्र नारायण पाणिग्राही, जगदलपुर

adji

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