पुपुल साड़

माह नवम्बर- दिसम्बर में बस्तर के गाँव-गाँव में पुपुल साड़ मनाया जाता है। यह समय आदिवासी समाज के लिये फुर्सत का होता है, वह अपने श्रम से उपजाये फसल को काटने के बाद खलिहान में पहुँचा कर निष्चिन्त हो जाता है। दीवाड़ अर्थात दीपावली मनाने के बाद उसके पास धान काटने और उसे खलिहान में संग्रह करने के अलावा कोई काम नही होता है। आदिवासी समाज उपज को खलिहान में संग्रहण करने के बाद उसकी मिंजाई आराम से करता है, लगभग जनवरी-फरवरी माह में करता है। यह समय बस्तर में मेला-मंडई का होता है और मेंला-मंडई में आदिवासी समाज को क्रय षक्ति की आवष्यकता होती है, इनमें धन संचय करने की प्रवृति नहीं होती है, इसलिये ये लोग अपनी सीमित आवष्यकता की पूर्ति हाट-बाजार या मेला-मंडईं में अपनी उपज विक्रय कर के करते हैं। यही कारण है कि उपज की मिंजाई आराम से करते है। एक कारण इसे भी माना जा सकता है कि मिंजाई के बाद फसल को रखने की जगह एवं साधन की कमी भी है। ऐसे फुर्सत के पल में आदिवासी समाज पुपुल साड़ मनाता है।

पुपुल का अर्थ ?

गोंडी शब्द पुपुल का अर्थ उड़द होता है और साड़ का अर्थ देवोत्सव होता है। जाहिर है कि इस साड़ में भी आदिवासी उड़द की जोगानी करता है, साथ में सेम की भी जोगानी करता है। सेम को गोंडी में जाटांग कहा जाता है। यह पहला उपज है, जिसके नाम से साड़ का नाम पड़ा है, इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आदिवासियों के जीवन में उड़द का कितना महत्व है। आदिवासी समाज का प्रत्येक त्यौहार बिना पूड़ी-बड़ा के सम्पन्न नहीं होता है और उड़द से बड़ा बनता है, जिसे गोंडी में आरिंज कहते हैं। यही कारण है कि आदिवासी समाज उड़द की

बस्तरिया बियर

यह एक प्रकार का मादक पेय है जिसे आम भाषा में ताड़ी भी कहते है आदिवासियों जीवन में सल्फी मादक पेय ही नहीं बल्कि सामाजिकता का प्रतीक भी है जानते है क्या खूबियां है इस पेय में

इस कारण से चित्रकोट जलप्रपात सूख गया

जानिए क्या कारण है चित्रकोट जल प्रपात सूख गया है चंद दिनांे में ही चित्रकोट में पानी देखने को
मिला ठीक वैसे ही जैसे यह आमतौर पर देखने को मिलता है। बस्तर के नियाग्रा फाल समझे जाने वाले इस चित्रकोट
जलप्रपात में हर साल काफी संख्या में पर्यटक आते है । इस बार पर्यटकों के साथ पर्यावरण प्रेमी भी चित्रकोट फाॅल के
इस रूप पर अचंभित थे जानिए क्या है वें
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जोगानी अनिवार्य रूप से करता है, कारण कि जो उड़द वह पहले जोगाया होता है, वह समाप्ति पर होता है और सामने आने वाले त्यौहार के लिये उड़द की जोगानी करना अनिवार्य होता है। इससे दाल भी बनता है, जो षादी-विवाह या अन्य अवसरों में होने वाले सामूहिक भोज में पकाया जाता है। इस समय तक वे पुराने उड़द का ही प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार सेम जोगाने की भी जल्दी होती है, कारण की सेम की फली इस समय तक परिपक्व होकर सूखने लग जाती है, इसलिये इन दोनों उपजों की जोगानी करना आवष्यक हो जाता है। उड़द का बड़ा (आरिंज) षुभ अवसर पर या त्यौहार में अनिवार्य रूप से बनाया जाता है, इसे हल्बी में बोबो कहते हैं।

कैसे मनाया जाता है यह त्यौहार

पुपुल साड़ मनाने के लिये भी पेन जोड़िंग (देव निमंत्रण) निकाला जाता है, जो इस साड़ के महŸव को दर्षाता है। पेन जोडिंग केवल दो अवसरों में एक नवा खानी और दूसरा पुपुल साड़ मनाने के लिये ही निकाला जाता है। पुपुल साड़ मनाने के लिये पूरे परगने की एक महŸवपूर्ण बैठक आहूत की जाती है, जिसमें परगना के अन्तर्गत आने वाले सभी गाँव के बुजुर्ग लोग अनिवार्य रूप से भाग लेते है। बैठक में पुपुल साड़ मनाने का दिन तय करने के साथ, सभी को अपने गाँव से चन्दा में देय राषि जो साल भर का हिसाब है, उसे भी लाने को कहा जाता है। साड़ मनाने का दिन तय हाने पर पेन जाड़िंग वालों को तय किया जाता है कि कौन दल किस दिषा में जायेगा और वापस कब लौटेगा। पुपुल साड़ मनाने के एक-दो दिन पहले पेन जोड़िंग वाले परगना देव का प्रतीक ध्वज लेकर तोड़ी फँूकते परगना के प्रत्येक गाँव जाते हैं। पहले से निष्चित स्थान में ठहर कर विश्राम करते हैं, जहाँ भोजन करना है, वहाँ भोजन करते हैं रात विश्राम किये जाने वाले गाँव में रात को ठहरते है, ये सब समय और स्थान पहले से तय होता है। इस प्रकार निमंत्रण देकर वे साड़ मनाने से पूर्व रात में परगने के देव गुड़ी में रात्रि विश्राम करते हैं। पेन जाड़िंग वालों का एक से अधिक दल होता है, वे सभी अपने साथ गाँव वालों के द्वारा दिये गये भेंट मुर्गा, चावल, षराब को जमा करके सामूहिक रूप से पका कर खाते-पीते हैं। गाँव वालों के द्वारा दी गयी सामग्री पर इनका अधिकार होता है। परगने के देव गुड़ी में सोने को नेवता सोनी कहा जाता है, जिसका अर्थ देवता को आमंत्रित करने के लिये सोना होता है।
पुपुल साड़ के लिये निष्चित दिन परगना के सभी गाँव से 8-10 जवाबदार लोग अपनी पूरी तैयारी से आते हैं। सबसे आष्चर्य की बात यह होती है कि इस साड़ में मंडा देव या परगना के देव के अन्तर्गत आने वाले देवताओं को नही लाया जाता, सभी लोग जो देवता से सम्बधित होते है वे ही अपने गाँव के देवताओं का प्रतीक लेकर आते हैं। प्रतीक प्रायः तोड़ी (दुदुम्भी) होती है। गाँव के माटी गांयता, ग्राम पटेल, सिरहा, गुनिया, और जो भी गाँव में समझदार व्यक्ति होता है, उसे अनिवार्य रूप से लाते है। देवता लाने के बजाय उनके प्रतिकों को लाया जाता है। इसका कारण बताया जाता है कि इस साड़ में साल भर में परगना के अन्दर हुये विवाद का निपटारा किया जाता है, कभी-कभी तो विवाद के बीच अप्रिय स्थिति बन जाती है और मार-पीट की नौबत आ जाती है। इन सब मानवीय दुर्गुणों का प्रदर्षन अपने देवताओं के सामने करना आदिवासी समाज अच्छा नहीं समझता, इसलिये इस साड़ में देवताओं को नहीं लाया जाता है। आदिवासी समाज के किसी भी बैठक में समस्या के समाधान में विवाद हो सकता है परन्तु मार-पीट करना सारे समाज का अपमान माना जाता है। इस प्रकार के कृत्य के लिये कठोरतम दण्ड का प्रावधान है, जो प्रायः सामाजिक बहिश्कार का होता है। आदिवासी समाज का हर व्यक्ति अपने समूह में जीने का आदी होता है, उसके लिये सामाजिक बहिश्कार की सजा बहुत भयावह होती है, जो उसके लिये जीवन-मरण का प्रष्न होता है। ऐसी स्थिति से बचने का पूरा प्रयास किया जाता है।

 

परगना के देव गुड़ी (मंदिर) में सभी गाँव के लोग जमा होते है, गुड़ी के प्रागंण में पहले से बैठने की व्यवस्था में चटाई, दर्री बिछी रहती है, सभी लोग आकर उसमें बैठते हैं। परगने का भण्डारी सबके सामने साल भर में परगने के अन्तर्गत आने वाले गाँव से कितना चन्दा के रूप में चावल, रूपया पैसा आया और उसे किस मद में खर्च किया गया, उसका हिसाब सबके सामने रखता है, साथ में उन गाँवों के बाबत् भी बताता है, जिन गाँवों से समय-समय में निर्धारित चन्दा नहीं आया होता है। इसके बाद एक-एक करके सभी गाँव के लोग अपनी बचत राषि, चावल भण्डारी के पास जमा कराते है। सबके द्वारा चन्दा जमा कर देने के बाद भण्डारी आज होने वाले खर्च को अलग कर इस वर्श कितनी राषि बचत हुई उसका हिसाब देता है और पुरानी बचत राषि में उस पैसे को और चाँवल जोड़ कर सभी को बताता है। इस राषि या चावल का उपयोग किसी व्यक्ति द्वारा आकस्मिक कार्य आ जाने के कारण खर्च कर लिया गया हो तो इस बाबत् भी सभी को बताया जाता है। इस समय परगना के गाँव का माटी गांयता और उसका सहयोगी परगने के देवता की पूजा की तैयारी करते रहते हैं। गुड़ी (मंदिर) के प्रागंण में वे उन सब स्थानों में दीप जलाते हैं जिनमें किसी न किसी देवता का स्थान होता है। हिसाब-किताब खत्म होने के बाद वह सभी परगना के लोगों के समक्ष माटी गांयता मंडा देव की विधिवत पूजा करता है और अपने साथ लाये हुये उड़द, सेम को परगना के देव को अर्पित करता है। इस समय प्रार्थना की जाती है कि “हे देव आज हम आपको पुपुल (उड़द) और जाटांग (सेम) अर्पित कर रहे है, इसे स्वीकार करो और पूरे परगने को प्राकृतिक आपदा, बीमारी से बचाओ साथ ही परगना में सुख-समृद्धि लाओं”। इसके पष्चात प्रत्येक0 गाँव के माटी गांयताओं द्वारा लाये गये उड़द और सेम को मंडादेव में अर्पित कर फिर बचे हुये को उन्हे वापस दे दिया जाता है, जिसे वे अपने-अपने गाँव के देवता, माटी माता  डूमा देव (पितृ देव) में अर्पण करते है।

पुपुल साड़ एक तरह से परगने की आम सभा होती है, इसमें परगना के अन्तर्गत आने वाले सभी गाँव के लोगों को भाग लेना होता है परन्तु इसमें देव से सम्बन्धित लोगों के अलावा वे लोग जिनका साल भर में किसी न किसी के साथ कोई विवाद हुआ रहता है और उनका निराकरण किसी कारण से गाँव में नहीं हो पाता है, वे आवष्यक रूप से भाग लेते है। ये विवाद प्रायः देवताओं से ही सम्बन्धित होते हैं, जिनका निराकरण मंडा देव के समक्ष किया जाता है। कुछ सामाजिक विवाद भी होते हैं जो प्रायः षादी-विवाह से सम्बन्धित होते है, जिनका सम्बन्ध दो गाँव से होता है। जैसे किसी परिवार की लड़की को किसी परिवार ने अकारण छोड़ दिया हो या लड़की उस परिवार में नहीं रहना चाहती हो आदि। ऐसी सभी समस्याओं पर इस बैठक में विचार किया जाताा है और समाधान निकाला जाता है। एक समय के बैठक में यह प्रमुख विशय था कि समाज के प्रमुख लोगों की अनुपस्थिति में कुमेटी परिवार ने देव विवाह किया था। यह समय दषहरा का था जब परगने के सारे मांझी मुखिया राजाज्ञा से दषहरा के लिये रियासत काल की राजधानी जगदलपुर गये हुये थे और कुमेटी परिवार के द्वारा देवाज्ञा से देव विवाह सम्पन्न कराया गयी था। यह वह समय होता है तब सारे देव काम स्थगित होते हैं। इसमे ये सब प्रमुख लोग भी नहीं थे, जबकि इनका इस विवाह में रहना अनिवार्य था। निर्णय हुआ कि कुमेटी परिवार दण्ड का भागी होगा, चूँकि इस कार्य में देवाज्ञा प्रभावी था मगर प्रमुखों को नजरअन्दाज करना भूल थी जिसका दण्ड लिया गया।

देवताओं से सम्बन्धित विवाद प्रायः एक देवता के द्वारा दूसरे देव के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करने से होता है, जिसका हल सब लोगों के आपसी विचार से किया जाता हैं परन्तु वह व्यक्ति जो इस अतिक्रमण से प्रभावित होता है, वह अड़ जाता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है और निराकरण की माँग करता हे। इस प्रकार के विवाद को समझने के लिये एक जानकार व्यक्ति से सम्पर्क करके उसके बताये अनुसार जब प्रभावित व्यक्ति को यह किसी देवता से मालूम होता है कि उसके कश्ट का कारण दूसरे गाँव के देवता के मानने वाले लोगों का किया धरा है, तब वह परगने में इस विशय को उठाता है और निराकरण की माँग करता है। कभी-कभी आपसी द्वेश के कारण भी यह स्थिति आ जाती है, किसी व्यक्ति ने किसी के ऊपर जादू-टोना कर दिया हो और प्रभावित व्यक्ति को इस बाबत् किसी माध्यम से जानकारी हुई हो, ऐसे विवाद में, इस बैठक से पहले मार-पीट हो चुका होता है और इसका समाधान गाँव की बैठक में नहीं निकला होता है, तब यह परगने की बैठक में आता है। इस बैठक में सभी पक्ष अपनी बातों को सिलसिलेवार रखते हैं, किसी के पास कोई साक्ष्य होता है या किसी की गवाही करानी हो तो कराता है। परगने के लोग सभी पक्ष की बातों को सुनकर अपना निर्णय देते हैं, जो प्रायः विवाद को सुलझाने वाला होता है। जादू-टोना, टोना-टोटका के विवाद जटिल होते हैं, ऐसे आरोप षक के आधार पर लगाये जाते हैं और विवाद बढ़ जाने की पूरी सम्भावना होती है, यहाँ तक की मार-पीट भी हो जाता है, ऐसी अप्रिय स्थिति से बचने का पूरा प्रयास किया जाता है, फिर भी प्रायः ऐसी स्थिति आ ही जाती है। देव विवाद के विशय में सभी को चेतावनी दी जाती है कि पहले कोई झगड़ा नहीं करेगा, यदि हो जाता है तो इसका प्रचार नहीं किया जायेगा, वरना परगने की बदनामी होगी, इसका पालन किया जाता है।

बस्तर के आदिवासी समाज का सामाजिक ताना-बाना बहुत ही मजबूत होता है, जो समय-समय पर होने वाले ऐसी बैठकों से और अधिक पुश्ट होता जाता है। इन बैठकों में किसी व्यक्ति की जानकारी में यह बात होती है कि परगने के किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी सामाजिक नियम का उल्लंघन किया गया है, तो ऐसा व्यक्ति इस बैठक में उस बात को उठा सकता है। परगनों की बैठक या गाँव की बैठक में महिलाओं का आना वर्जित होता है, वे बैठक भी नहीं बुला सकती, वे अपने किसी रिष्तेदार के माध्यम से बैठक बुला कर, अपनी बात रखती हैं। पुपुल साड़ के समय होने वाले इन बैठकों में ऐसे मामले लाये जाते हैं जो वर्जित गोत्र में किसी के द्वारा विवाह कर लिया हो। आदिवासी समाज ऐसे विवाह का समर्थन और प्रोत्साहन नहीं करता बल्कि सम गोत्रीय विवाह के लिये कठोर दण्ड देता है। आदिवासी समाज का सबसे कठोर दण्ड सामाजिक बहिश्कार है, जो किसी भी परिवार के लिये अपमानजनक होता है। किसी भी माध्यम से जब इस बात की पुश्टि हो जाती है कि उनके परगने के अन्तर्गत सम गोत्रीय विवाह हुआ है और इसके विशय में गाँव की बैठक में विचार कर लिया गया है, जिसका समाधान किया गया है, उसे इस बैठक में बताया जाता है। यदि समाधान नहीं हुआ है तो फिर उस विशय पर विचार किया जाता है।
सम गोत्रीय विवाह के विशय में चर्चा के दौरान बैठक में उपस्थित लोगों का स्पश्ट रूप से दो वर्ग बन जाता है। एक वर्ग के लोग किसी तरह इस विवाद का निपटाने के लिये विचार व्यक्त करते हैं, तो दूसरा पक्ष कठोर सजा दिलवाने के लिये अपना विचार रखता है। कभी अप्रिय स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है, जिसे उपस्थित वरिश्ठ लोग षांत करा देते हैं02। गोत्र नहीं मिलने की दषा में उस गोत्र के लोग किस मंडा (मंडप) के अन्तर्गत आते हैं और उस मंडा का देवता कौन है, उसे किस गोत्र के लोग मानते हैं, उनके विशम गोत्रीय पक्ष कौन हैं, इन सब बातों का मिलान किया जाता है। कभी-कभी इस तरह के प्रयास करने से बात बन जाती है परन्तु सामाजिक नियम का दण्ड देना ही पड़ता है। परगने के लोगों के द्वारा यह प्रयास किया जाता है कि बात बन जाये, फिर भी बात नहीं बनती तब सामाजिक बहिश्कार का निर्णय लिया जाता है। इसके अलावा जो सामाजिक विवाद होते हैं, जैसे लड़की को अकारण छोड़ देना या लड़की का विवाह के बाद ससुराल से भाग जाना, इसे गाँव की बैठक में ही निपटा लिया जाता है। उन्हीं विवादों को इस बैठक में लाया जाता है, जिसका विशय दो परगने से होता है। ऐसे विवाद का हल किसी समय विषेश में दोनों परगने की बैठक आहूत कर हल निकाला जाता है।
इस समय जब परगनों की महत्वपूर्ण बैठक चल रही होती है, उस समय कुछ लोग भोजन बनाते हैं। अन्त में सभी परगना देव के परिसर से बाहर जाकर एक साथ अपने-अपने गाँव से लाये षराब को एक गोल घेरे में बैठकर पीते हैं और बाद में सब भोजन करके विदा होते हैं। इस तरह सम्पन्न होता है आदिवासी समाज का पुपुल साड़।

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